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March 31, 2025

हिमाचल के वो देवता महाराज- जिन्हें कहा जाता है गरीबों का मसीहा, मौके पर करते हैं फैसला

किसी कचहरी से कम नहीं है देवता साहिब का दरबार

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Devta Sahib Shri Rudra Ji Maharaj

शिमला। देवभूमि हिमाचल की धार्मिक आस्था भी इसे विशेष बनाती है। हिमालय की इन पवित्र वादियों में ऐसा विश्वास है कि यहां का हर कण देवी-देवताओं की उपस्थिति से पवित्र है। ये देवता न केवल मंदिरों और पूजास्थलों में पूजे जाते हैं, बल्कि हर पर्वत, झरने और जंगल को उनका निवास स्थान माना जाता है।

हर गांव का अपना देवता

यहां के लोग देवी-देवताओं को अपनी संस्कृति और परंपराओं का आधार मानते हैं। हर गांव का अपना एक देवता होता है, जिसे "ग्राम देवता" कहा जाता है। लोग अपनी समस्याओं के समाधान और जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में देवताओं का मार्गदर्शन लेते हैं।

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गरोबों के हैं मसीहा

आज के अपने इस लेख में हम आपको एक ऐसे देवता साहबि के बारे में बताएंगे- जो कि शिमला-नावर के पुजारली 4 में विराजमान है। हम बात कर रहे हैं शिव अवतार देवता साहिब श्री रूद्र जी महाराज की- जिन्हें गरीबों के मसीहा कहा जाता है। ये देवता साहिब गरीबों संग अन्याय सहन नहीं करते हैं और तुरंत ही दंड भी देते हैं।

 

भाइयों साथ आए थे हिमाचल

देवता साहिब श्री रूद्र जी महाराज अपने दो भाइयों : देवता साहिब बनाड़ जी और देवता साहिब धोंलू जी के साथ कश्मीर से हिमाचल आए और समस्त नावर क्षेत्र पर अपना अधिपत्य स्थापित किया।

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गांव वालों ने दिया रोट

बताते हैं कि देवता साहिब रूद्र जी महाराज के दोनों भाइयों ने यात्रा के दौरान ही अपने स्थान का चयन कर लिया था। ऐसे में वो आगे बढ़ते हुए अढाहल बशला के जंगलों में पहुंचे- जहां के स्थानीय लोगों ने देवता जी को नकारात्मक शक्ति समझ- उन्हें रोट का भोग अर्पित किया, जो देवता जी को बिलकुल पसंद नहीं आया।

वहीं रुक गया हल

देवता साहिब वो स्थान को त्याग कर ढुरला धार के काली माता मंदिर में पहुंचे। जहां कालियों के साथ वार्तालाप करने के बाद उन्होंने पुजारली 4 में बसने का फैसला ले लिया। फिर देवता जी कोटी गांव में कथरू जमींदार के खेत सजार बगोड़ा पहुंचे- जहां उन्होंने मजदूरों को हल जोतते देखा, तो वे उसी हल के आगे जमीन में समाहित हो गए- जिससे हल वहीं रुक गया। ऐसे में जब जमींदार ने इस चमत्कार के बारे में सुना - तो वो भागा-भागा अपने खेतों में आया और तभी देवता जी मिट्टी से स्वयं ही बाहर निकल आए और मूर्ती रूप में कथरू जमींदार की गोद में आ बैठे।

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