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October 5, 2025

हमारे हिमाचल की वो देवी मां- जिन्होंने उठाया महामारी खत्म करने का जिम्मा, हजारों भक्तों को बचाया

मां ने साधारण मजदूर को चुना पहला गूर

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Himachal Devi Devta

शिमला। हमारे हिमाचल की एक ऐसी देवी मां हैं जिन्होंने एक साधारण मजदूर को अपना पहला गूर बनाया था। फिर जब इन देवी मां के क्षेत्र में महामारी फैली, तब इन्होंने खुद उस महामारी को मिटाने का जिम्मा उठाया और हजारों भक्तों की जान बचाई। 

चमत्कारों की कहानी आज भी अमर 

ये देवी मां हैं चंबा चुराह की देहरीघाट में विराजमान शक्ति माता की जिनके चमत्कारों की कहानी आज भी अमर है। तो फिर ये पूरी कथा शुरू होती है चुराह घाटी के कुंडा गांव से- जहां साध नाम का एक व्यक्ति रहता था। 

 

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आंखों के आगे अंधेरा छा गया अंधेरा

पेशे से मजदूर था और काम के सिलसिले में अकसर बाहर जाया करता था। मगर एक दिन काम पर जाते हुए अचानक उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसे उजाला नजर आया लेकिन आगे कुछ भी नहीं दिख रहा था। 

अंधेरे में दिखी एक चमकती हुई मूर्ति 

मगर तभी उसकी आंखों के सामने छाए अंधेरे में उसे एक चमकती हुई मूर्ति दिखाई दी। जिसे साध ने चमत्कारी समझकर उठा लिया और अपने घर ले आया। मगर मूर्ति को घर में रखते ही उसके शरीर में कंपन शुरू हो गई और यह सिलसिला पूरे छह महीने तक चलता रहा।

 

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माता ने शरीर में प्रवेश कर बनाया गूर

लोग बताते हैं माता ने उसी के शरीर में प्रवेश कर उसे अपना गूर बना लिया था। इसके बाद एक रात माता ने उसे आदेश दिया कि मेरी मूर्ति को चिहोट नामक स्थान पर विराजित करो। फिर अगले ही दिन उसने माता को वहां लेजाकर विराजमान कर दिया और उसके शरीर की कंपन समाप्त हो गई। 

डर के साये में जीने लगे गांव के लोग 

फिर साध ने वहां एक देहरा बनाया और तभी से इस स्थान का नाम देहरीघाट पड़ गया। फिर इसके कुछ समय बाद इलाके में महामारी फैल गई, हजारों मवेशी मर गए और एक आदमखोर बाघ ने भी उस क्षेत्र में आतंक मचा दिया और गांव के लोग डर के साये में जीने लगे।

 

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हर साल यहां करेंगे चार दिवसीय मेला 

ऐसे में गांव के लोगों ने माता के प्रांगण में एक बहुत ही बड़ा महायज्ञ करवाया और प्रार्थना की कि माता उन्हें महामारी और बाघ के संकट से मुक्त कर दें। साथ ही मन्नत मांगी कि यदि यह संकट टल जाए तो वे हर साल यहां चार दिवसीय मेला करेंगे।

हर साल लगता है चार दिवसीय मेला 

इसके बाद माता ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और तब से लेकर आज तक यहां न तो कोई महामारी फैली और न ही किसी बाघ या अन्य जानवर ने किसी इंसान पर हमला किया। आज भी चुराह घाटी के लोग इसे शक्ति माता का आशीर्वाद मानते हैं और यहां हर साल चार दिवसीय मेला भी आयोजित किया जाता है।

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