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December 6, 2025
हिमाचल में 54 साल बाद शांत महायज्ञ: 80 करोड़ का खर्च- भीड़, तलवारों और हुंकार ने सबको चौंकाया
डेढ़ करोड़ से बना नया मंदिर, तैयारी पर 80 करोड़ तक का अनुमान
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिला के जुब्बल उपमंडल का झड़ग गांव इन दिनों पूरी तरह देवत्व, आस्था और हिमाचली लोकसंस्कृति की भव्यतम छटा से सराबोर है। देवता नागेश्वर की छत्रछाया में आयोजित ऐतिहासिक शांत महायज्ञ 54 साल बाद हो रहा है और गांव से लेकर पूरे क्षेत्र में उत्सव, ऊर्जा और आध्यात्मिक माहौल चरम पर है।
शुक्रवार की सुबह ठीक 4 बजे नाथ साधु द्वारा बजाए गए शंख की ध्वनि ने वातावरण में ऐसी आध्यात्मिक तरंगें फैलाईं, मानो सदियों पुराने देव अनुष्ठान फिर जीवंत हो उठे हों। इसके बाद गांववासियों ने प्राचीन फेर रस्म निभाई। युवा तलवारें, लाठियां और बंदूकें लेकर जयकारों, नृत्य और लोकगीतों के साथ पूरे क्षेत्र की परिक्रमा पर निकले। यह परिक्रमा बुरी शक्तियों से रक्षा और सुख-समृद्धि की मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है।
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परिक्रमा के बाद देव विधि के सबसे पवित्र भाग, शिखा पूजन की प्रक्रिया शुरू हुई। देवता साहिब धौंलू महाराज और देवता नागेश्वर के पुरोहितों ने स्थानीय ग्रिप्टा खानदान और देव गुरों की मौजूदगी में शिखर पर लाल, सफेद और पीली पताकाएं फहराईं। नारियल काटकर रस्म को पूरा किया गया।
इसके बाद आमंत्रित भिन्न-भिन्न खूंदों ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य, गायन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। ढोल-नगाड़ों की थाप, देव जयकारों और लोकगीतों से पूरा झड़ग क्षेत्र देवमय हो उठा। आज शांत महायज्ञ का आखिरी दिन है। उछड़-पाछड़ रस्म के साथ देव शक्तियों और मेहमानों को विदाई दी जाएगी।
शांत महायज्ञ में नाथ साधुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु गोरखनाथ की परंपरा से जुड़े ये साधु विशेष मंत्रों का जाप कर देव शक्तियों का आह्वान करते हैं।
पूरे आयोजन में पूजा, अर्चना और ध्यान द्वारा वे सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखते हैं।
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इस बार उत्तराखंड के नैंटवाड़ स्थित दानवीर कर्ण महाराज मंदिर के कैलाश नाथ प्रमुख भूमिका में हैं। वे 22 नवंबर से हर रात गांव की परिक्रमा कर रहे हैं शांति, अच्छी फसल और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का आह्वान करते हुए।
इस बार का महायज्ञ इतने बड़े पैमाने पर है कि इसकी तैयारियां महीनों चलीं। मंदिर का निर्माण लगभग 1.5 करोड़ रुपये से किया गया। पूरे ताम-झाम, देव व्यवस्थाओं और मेहमाननवाजी पर लगभग 80 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। आयोजन के लिए 7 गांवों में व्यवस्था की गई है। हर घर में मेहमानों के खाने-पीने और ठहरने की तैयारी की गई है। इस महायज्ञ में भगवान परशुराम के साथ लगभग 500 देवलू शामिल होंगे।
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यह पारंपरिक अनुष्ठान सदियों पुरानी संस्कृति का प्रतीक है। माना जाता है कि देवता नागेश्वर की प्रचंड शक्ति को शांत करने, क्षेत्र की सुरक्षा, सुख, समृद्धि और मंगल के लिए यह महायज्ञ किया जाता है। 1971 के बाद यह आयोजन पहली बार हो रहा है, इसलिए श्रद्धालुओं में उत्साह और आस्था चरम पर है।