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September 15, 2026
देवताओं को युद्ध में हराकर 'शिख-पाथा' जीत ले गई डायनें, हिमाचल में आगे क्या होगा.. गुर ने की देववाणी
माता बगलामुखी की जाग में गूंजी देववाणी
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मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के तुगल क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में वार्षिक जाग का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक देव आस्था के साथ किया गया। रातभर मंदिर परिसर में माता के भजनों की गूंज सुनाई देती रही और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने जाग में पहुंचकर माता का आशीर्वाद लिया। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ गुर के माध्यम से देववाणी हुई, जिसमें देवताओं और डायनों के बीच होने वाले पारंपरिक युद्ध की कथा सुनाई गई। देववाणी में इस वर्ष डायनों की जीत होने की बात कही गई, जिसे आने वाले वर्ष के लिए कई महत्वपूर्ण संकेतों से जोड़कर देखा गया।
मंदिर के पुजारी अमरजीत शर्मा ने बताया कि जाग का शुभारंभ रात करीब 12 बजे माता की विशेष पूजा-अर्चना के साथ हुआ। इसके बाद मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन का सिलसिला शुरू हुआ। श्रद्धालु देर रात तक माता के दरबार में डटे रहे और भजनों के माध्यम से मां की आराधना की।
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जाग में पंचकूला हरियाणा के प्रसिद्ध गायक जसपाल जस्सी और जय पाल सहोता सहित यतिन, अभिनव, अग्नि भजन मंडली साईंगलु, शर्मा भजन मंडली सेहली और गायक नंदलाल ने माता बगलामुखी के भजनों की प्रस्तुति दी। भक्ति गीतों पर श्रद्धालु भाव-विभोर नजर आए और पूरा मंदिर परिसर माता के जयकारों से गूंजता रहा।
वार्षिक जाग का सबसे महत्वपूर्ण और श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल भरा क्षण उस समय आया, जब गुर के माध्यम से देववाणी हुई। इसमें देवताओं और डायनों के बीच होने वाले पारंपरिक युद्ध की कथा और उसके परिणामों के बारे में जानकारी दी गई।
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देववाणी के अनुसार देवता आषाढ़ माह की शैणदेवी एकादशी के दिन युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं, जबकि युद्ध का निर्णायक चरण भाद्रपद माह में माना जाता है। मान्यता के अनुसार इस पूरे संघर्ष के दौरान देवताओं और डायनों के बीच कुल सात बार मुठभेड़ होती है। इनमें तीन बार देवताओं की विजय और चार बार डायनों की जीत का उल्लेख किया गया।
देववाणी में बताया गया कि युद्ध का पहला चरण समुद्र के टापू पर और अंतिम मुकाबला घोषर धार नामक स्थान पर होता है। इस बार अंतिम युद्ध में डायनियां ‘शिख-पाथा’ लेकर चली गईं। इसी परंपरागत मान्यता के आधार पर इस वर्ष के युद्ध में डायनों की जीत मानी गई। जाग के दौरान हुई इस देववाणी को श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ सुना। मंदिर में मौजूद लोगों के लिए यह क्षण धार्मिक आस्था और स्थानीय देव परंपरा से जुड़ा विशेष अनुभव रहा।
स्थानीय मान्यता के अनुसार डायनों की विजय को फसल के लिहाज से शुभ संकेत माना जाता है। देववाणी में भी वर्षभर अच्छी फसल होने के संकेत बताए गए। श्रद्धालुओं का मानना है कि डायनों की जीत के बाद खेतों में पैदावार अच्छी रहती है और कृषि क्षेत्र के लिए वर्ष अनुकूल रहने की उम्मीद की जाती है।
हालांकि इसी मान्यता में यह भी कहा जाता है कि डायनों की जीत के साथ वर्ष के दौरान असामयिक संकट या प्राकृतिक आपदाओं की आशंका बनी रह सकती है। इसलिए इस विजय को एक ओर अच्छी फसल का संकेत माना जाता है, तो दूसरी ओर जनजीवन और मौसम से जुड़े संभावित खतरों के प्रति सतर्क रहने का संदेश भी माना जाता है।
स्थानीय देव परंपरा में देवताओं और डायनों की जीत को अलग-अलग संकेतों से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि यदि युद्ध में देवताओं की विजय होती है तो वर्षभर शांति, सुख और समृद्धि का वातावरण बना रहता है, लेकिन कृषि उपज के लिहाज से परिस्थितियां उतनी अनुकूल नहीं मानी जातीं। वहीं इस बार डायनों की जीत को अच्छी फसल और बेहतर कृषि उपज की उम्मीद से जोड़कर देखा जा रहा है। जाग में हुई देववाणी के बाद श्रद्धालुओं के बीच वर्षभर की परिस्थितियों को लेकर चर्चाएं भी होती रहीं।
माता बगलामुखी मंदिर सेहली की वार्षिक जाग केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने क्षेत्र की सदियों पुरानी देव परंपराओं और लोक मान्यताओं को भी जीवंत किया। रातभर चले भजन, पूजा-अर्चना और देववाणी के बीच श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में अपनी मनोकामनाएं रखीं।
देववाणी में बताई गई अच्छी फसल की भविष्यवाणी ने किसानों और ग्रामीणों के बीच उम्मीद जगाई है। वहीं संभावित संकट और आपदाओं से जुड़े संकेतों को देखते हुए लोग इसे प्रकृति और जनजीवन के प्रति सतर्क रहने का संदेश भी मान रहे हैं। इस तरह सेहली की वार्षिक जाग आस्था, लोकविश्वास और क्षेत्र की विशिष्ट देव संस्कृति का महत्वपूर्ण संगम बनकर सामने आई।