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April 13, 2026

हिमाचल में बैसाखी पर खुशियां नहीं, मनाया जाता है पछतावा : एक बेटी के बलिदान ने खत्म की थी कुप्रथा

नदी में प्रवाहित करते है गुड्डे-गुड़िया

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Baisakhi 2026

शिमला। जहां एक ओर पूरे देश में बैसाखी का पर्व खुशी, उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है, वहीं हिमाचल प्रदेश के कुछ जिलों में यही बैसाखी यानी ‘बसोआ’ के रूप में एक अलग ही भावनात्मक मायने रखती है। यहां यह त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक बेटी के दर्दनाक बलिदान की याद में मनाया जाता है, जो आज भी लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ता है।

बैसाखी का पर्व एक कुप्रथा 

बता दें कि हिमाचल के मंडी जिले के सरकाघाट उपमंडल के पिंगला गांव से जुड़ी यह परंपरा आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। लोकगीतों में बसोआ के करुण स्वर आज भी गूंजते हैं, जो उस समय की एक ऐसी घटना को याद दिलाते हैं, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया था।

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पैसों के लिए बुजुर्ग के साथ कर दी थी शादी

बताया जाता है कि पुराने समय में पिंगला गांव में लौहला नाम की एक लड़की रहती थी। उस समय समाज में “बरीणा” नाम की एक प्रथा प्रचलित थी, जिसमें बेटी की शादी के बदले उसके परिवार को पैसे दिए जाते थे। इसी प्रथा के चलते लौहला के पिता ने उसकी शादी एक बुजुर्ग व्यक्ति के साथ तय कर दी और बदले में पैसे ले लिए।

बेटी ने लगाई नाले में छलांग 

लेकिन यह रिश्ता उस लड़की को बिल्कुल मंजूर नहीं था। अपने जीवन को इस तरह से तय होते देख वह अंदर से टूट चुकी थी। जिस दिन उसकी बारात आने वाली थी, उसी दिन उसने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सबको हिला दिया। उसने गांव के पास बहने वाले नाले में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

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इस दर्दनाक घटना के बाद पूरे इलाके में शोक की लहर फैल गई। लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ और तभी से मंडी क्षेत्र में बेटियों के बदले “बरीणा” लेने की प्रथा को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। हालांकि, उस बेटी के बलिदान की टीस आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है। 

बसोआ पर्व के दौरान गाया जाता है यह गीत 

बसोआ पर्व के दौरान आज भी उस बेटी को याद किया जाता है। लोकगीतों में उसका दर्द साफ झलकता है। लोग आज भी गुनगुनाते हैं, बसोए रा ध्याड़ा बापुआ, जुगा-जुगा जो याद रैहणा मेरे बापुआ। इन गीतों में न सिर्फ उस बेटी का दर्द है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी सीख भी छिपी है। एक और पंक्ति में कहा जाता है। 

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चंबा में भी मनाई जाती है बसोआ

हुण देखया खादे लोका धयूआ रा बरीणा, मुश्किल हुई जादा बेटिया रा जीणा, यानि अब लोगों को समझ आ गया है कि बेटियों के साथ इस तरह का व्यवहार गलत है और उनकी जिंदगी को सम्मान देना जरूरी है। केवल मंडी ही नहीं, बल्कि चंबा जिले में भी बसोआ से जुड़े गीत गाए जाते हैं। वहां भी लोग इस पर्व को अपनी परंपरा और भावनाओं के साथ मनाते हैं आया बसोआ नी माये, पंजे सत्ते मुंजो, सादा नी आया कोय।

नदी में प्रवाहित करते है गुड्डे-गुड़िया

बसोआ पर्व के मौके पर पिंगला गांव में देव लक्ष्मीनारायण का भव्य मेला लगता है। इस दौरान लोग गुड्डे-गुड़िया बनाकर उन्हें पानी में प्रवाहित करते हैं, जो उस बेटी की याद और उसके बलिदान का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा ऐतिहासिक रिवालसर झील में भी इस अवसर पर बड़ा मेला आयोजित होता है।

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यहां हजारों श्रद्धालु एकत्रित होकर पवित्र स्नान करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। त्रिवेणी धर्म स्थली के रूप में प्रसिद्ध इस स्थान का धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है। जिला मंडी के अन्य धार्मिक स्थलों पर भी इस दिन स्नान और पूजा की विशेष परंपरा निभाई जाती है।

बेटी के बलिदान को आज भी रखा है जिंदा 

जहां एक ओर पंजाब में बैसाखी के मौके पर ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा की धूम रहती है, वहीं हिमाचल में बसोआ पर्व लोगों को एक गहरी सोच और समाज सुधार की कहानी से जोड़ता है। कुल मिलाकर, हिमाचल का बसोआ पर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी परंपरा है जो एक बेटी के बलिदान, समाज की गलती और उससे मिली सीख को आज भी जिंदा रखे हुए है।

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