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October 3, 2026

हिमाचल का ऐसा मंदिर जहां भंडारा लगाने को करना पड़ता है 10 साल इंतजार! बड़े-बड़े VIP भी लाइन में

शिमला के शोघी के पास पहाड़ी पर स्थित है मां तारा देवी मंदिर

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Tara devi temple shimla

शिमला। हिमाचल प्रदेश को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता। यहां पहाड़ों की चोटियों से लेकर घने देवदार के जंगलों तक अनगिनत देवी-देवताओं के मंदिर बसे हैं और हर मंदिर की अपनी अलग मान्यता, परंपरा और आस्था की कहानी है। लेकिन राजधानी शिमला के शोघी के पास पहाड़ी पर स्थित मां तारा देवी मंदिर की बात ही कुछ अलग है।

 

करीब 250 वर्ष पुराने इस प्राचीन मंदिर में दर्शन के लिए तो श्रद्धालु पहुंचते ही हैं, लेकिन यहां मनोकामना पूरी होने के बाद भंडारा करवाना भी अपने आप में एक लंबा इंतजार बन गया है। हालात ऐसे हैं कि नवरात्र और रविवार के दिन भंडारा करवाने की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं को करीब एक दशक तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा है। खास बात यह है कि इस लंबी कतार में आम श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े वीवीआईपी और चर्चित लोग भी अपनी बारी का इंतजार कर चुके हैं।

मनोकामना पूरी होने के बाद भंडारे के लिए 10 साल इंतजार

मां तारा देवी मंदिर में भंडारा करवाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। मान्यता और आस्था के चलते जब किसी भक्त की मनोकामना पूरी होती है तो वह माता के दरबार में भंडारा करवाने की इच्छा जताता है। इसके लिए श्रद्धालु मंदिर कार्यालय में अपना नाम दर्ज करवाते हैं। इसके बाद मंदिर प्रशासन आवेदनों के क्रम के अनुसार सूची तैयार करता है और श्रद्धालुओं को भंडारे के लिए तारीख दी जाती है।

 

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लेकिन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के चलते अब यह इंतजार लंबा होता चला गया है। नवरात्र और रविवार जैसे खास दिनों में भंडारा करवाने के लिए वेटिंग करीब 10 साल तक पहुंच चुकी है। वहीं मंगलवार या सरकारी अवकाश वाले दिन भंडारा करवाने के लिए भी श्रद्धालुओं को लगभग तीन साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।

 

यहां VIP भी अपनी बारी का करते हैं इंतजार

मां तारा देवी मंदिर की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भंडारा करवाने वालों की सूची में आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ बड़े पदों पर रह चुके और चर्चित लोग भी शामिल रहे हैं। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री सहित कई विधायक मंदिर में भंडारा करवा चुके हैं। करीब दो वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत सहित कई न्यायाधीशों ने भी यहां भंडारा करवाया था। यानी माता के दरबार में भंडारे की इच्छा रखने वालों के लिए हैसियत से ज्यादा बारी और मंदिर की तय व्यवस्था मायने रखती है।

 

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कोरोना ने बढ़ा दी श्रद्धालुओं की लंबी कतार

मंदिर प्रबंधन के अनुसार कोविड महामारी से पहले भी भंडारे के लिए करीब 5 से 7 साल की वेटिंग रहती थी। कोरोना काल में करीब दो साल तक मंदिर में भंडारे के आयोजन पर रोक रही। बाद में मंदिर खुला तो पहले से लंबित आवेदनों के साथ नए श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती गई। इसका असर भंडारे की तारीखों पर पड़ा और अब प्रतीक्षा अवधि करीब 10 साल तक पहुंच गई है।

तीन महीने में बनती है भंडारे की सूची

मंदिर में भंडारे की व्यवस्था भी बाकायदा तय प्रक्रिया के तहत होती है। श्रद्धालु अपना नाम मंदिर कार्यालय में दर्ज करवाते हैं। इसके बाद हर तीन महीने में सूची तैयार कर क्रम के अनुसार भंडारे की तारीख निर्धारित की जाती है। जब किसी श्रद्धालु की बारी आती है तो मंदिर प्रबंधन की ओर से उसे करीब दो दिन पहले सूचना दी जाती है। सामान्य दिनों में मंदिर परिसर में भंडारा सुबह करीब 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक चलता है। वहीं नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए भंडारे का समय सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक कर दिया जाता है।

 

 

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मंदिर की रसोई में ही तैयार होता है प्रसाद

मां तारा देवी मंदिर में भंडारा करवाने की व्यवस्था भी अपने आप में खास है। मंदिर प्रशासन की ओर से भंडारे के लिए खाद्य सामग्री की सूची निर्धारित की जाती है और उसी के अनुसार भोजन तैयार किया जाता है। भंडारा मंदिर की रसोई में तैयार किया जाता है और विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की भारी संख्या को देखते हुए अतिरिक्त व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।

क्योंथल रियासत की कुलदेवी हैं मां तारा 

मां तारा देवी को शिमला के समीप स्थित जुणगा की क्योंथल रियासत की कुलदेवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता तारा को मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
मंदिर प्रबंधन के अनुसार पहले माता का धार्मिक क्षेत्र काफी विस्तृत माना जाता था। वर्तमान में भी हिमाचल के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ बाहरी राज्यों से श्रद्धालु यहां माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

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करीब 250 साल पुराना है मंदिर का इतिहास

शोघी के पास पहाड़ी की चोटी पर करीब 1,851 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मां तारा देवी मंदिर का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना बताया जाता है। मान्यता के अनुसार सेन राजवंश के राजा भूपेंद्र सेन को मां तारा ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। इसके बाद उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए करीब 50 बीघा भूमि दान की। बाद में उनके वंशज बलवीर सेन ने अष्टधातु की माता की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

बिना सीमेंट और गारे के बनी पहाड़ी वास्तुकला

मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में इसकी पारंपरिक निर्माण शैली भी शामिल है। यहां लकड़ी और पत्थर की परतों से बिना सीमेंट और गारे के निर्माण की पारंपरिक पहाड़ी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर की छत पर स्लेट का इस्तेमाल किया गया है, जबकि लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी हिमाचली कारीगरों की कला को दर्शाती है। मंदिर के गर्भगृह में मां तारा देवी की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है।

 

 

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देवदार और बांज के जंगलों के बीच आस्था का दरबार

मां तारा देवी मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक खूबसूरती का भी अनोखा संगम है। चारों ओर फैले देवदार और बांज के घने जंगल, पहाड़ी वातावरण और ऊंचाई से दिखाई देने वाला शिमला शहर का नजारा श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। कई लोग सड़क मार्ग से मंदिर पहुंचते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु पहाड़ी रास्तों से पैदल चलकर भी माता के दरबार तक पहुंचते हैं।

पास ही स्थित है प्राचीन शिव कुटिया

मां तारा देवी मंदिर से कुछ दूरी पर घने जंगल के बीच शिव कुटिया भी स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह छोटा मंदिर शांत वातावरण के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। 
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कभी यहां एक संत कठिन परिस्थितियों में साधना किया करते थे। आज भी मंदिर के आसपास का शांत वातावरण लोगों को कुछ समय आध्यात्मिक एकांत में बिताने का अवसर देता है।

 

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दूध चढ़ाने के बाद ही होती है दूध-घी के सेवन की परंपरा

मां तारा देवी मंदिर के आसपास श्री वैष्णवी शक्ति माता दूधाधारी मंदिर भी स्थित है। यह मंदिर करीब 750 मीटर की दूरी पर है। स्थानीय मान्यता के अनुसार आसपास के कुछ क्षेत्रों में घर में गाय या भैंस के बछड़े के जन्म के बाद परिवार तब तक दूध या घी का सेवन नहीं करता, जब तक दूधाधारी माता के मंदिर में दूध अर्पित न कर दिया जाए। मंदिर परिसर में भगवान शिव का शिवलिंग भी स्थापित है और वर्ष 2009 में इसका पुनर्निर्माण एवं प्रतिष्ठापन किया गया था।

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