#धर्म
January 3, 2026
हिमाचल में है विष्णु भगवान की 4 मुखों वाली इकलौती मूर्ति- जिसे चुरा ले गई थे चोर, जानें इतिहास
मूर्ति के दोनों ओर दो रहस्यमयी आकृतियां भी मिलती हैं
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चंबा। देवभूमि हिमाचल के लोग देवी-देवताओं के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। हिमाचल के लोग अपने इष्ट देवता को परिवार का सदस्य मानते हैं और किसी भी शुभ कार्य, संकट या निर्णय के समय उनकी सलाह लेना आवश्यक समझते हैं। प्रदेश के हर गांव और क्षेत्र का अपना एक प्रमुख इष्ट देवता या देवी होती है, जिनकी नियमित रूप से पूजा-अर्चना की जाती है।
हिमाचल के लोगों की यह गहरी धार्मिक आस्था उन्हें न केवल एक-दूसरे से जोड़ती है, बल्कि उनकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोए रखती है। उनके लिए देवी-देवता केवल पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि उनके जीवन की शक्ति और प्रेरणा हैं। देवी-देवता केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन की शक्ति और मार्गदर्शक माने जाते हैं, जो हर परिस्थिति में लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
आज के अपने इस लेख में हम आपको हमारे हिमाचल के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे- जो कि दुनिया में इकलौता ऐसा मंदिर है- जहां भगवान विष्णु चार मुखों वाली मूर्ति में विराजते हैं। विष्णु भगवान की ये मूर्ती इतनी ज्यादा रेयर और इतनी ज्यादा कीमती है कि एक बार इसे चुरा भी लिया गया था, लेकिन करीब 45 दिनों के बाद इस मूर्ती को मुंबई से बरामद कर लिया गया।
हम बात कर रहे हैं चंबा जिले के हरि राय मंदिर की। जहां विराजित इस चतुर्मुखी विष्णु मूर्ति में-
माथे पर कमल मुकुट, कानों में धातु के अलंकार, कलाई में जड़े आभूषण और सबसे प्रभावशाली वह चमकदार चांदी की आंखें- जो हर किसी को विस्मृत कर देती हैं। इस मूर्ति के दोनों ओर दो रहस्यमयी आकृतियां भी मिलती हैं- एक पुरुष, जिसे चक्र, आकाश और वायु का रूप माना जाता है और एक स्त्री आकृति- जो चंद्रमा, अग्नि, माया और गदा की शक्ति का प्रतीक है।
सबसे पहले इस मंदिर को चंबा के सलबाहाना ने बनवाया था- शिखर शैली, पत्थर की महीन नक्काशियां और अंदर शिव–उमा, सूर्यदेव का रथ, सिंह व नंदी की प्रतिमाएं। मगर इससे भी ज्यादा चमत्कारी है रावी नदी से जुडी कथा।
लोग बताते हैं पहले इस मंदिर तक जाने का रास्ता नहीं होता था, क्योंकि मंदिर के पास से ही रावी नदी बहती थी। सिर्फ एक ऋषि ही रोज नदी पार कर पूजा करते थे। ऐसे में राजा साहिल वर्मन ने उनसे कहा- मंदिर सबका है, यहां सबको पहुंचने दो।”
कहते हैं, फिर वही ऋषि सात दिन की समाधि में गए- ध्यान में एक पवित्र डोरी बुनी और उसे नदी में फेंक दिया। बताते हैं उसी पल-रावी नदी ने दिशा बदल दी और आज भी उसी पवित्र डोर और इसी चमत्कार की याद मिंजर मेले के रूप में मनाई जाती है।
बाकी इस मंदिर ने एक काली रात भी देखी है जब 6–7 मई 1971 को 240 किलो की यह दिव्य कांस्य मूर्ति चोरी हो गई थी और पूरा चंबा सदमे में था। लेकिन 45 दिन के बाद-यह मूर्ति मुंबई के मझगांव में एक गोदाम से बरामद हुई और जिस दिन यह प्रतिमा वापस चंबा लौटी-लोग कहते हैं, उस दिन शहर ने राहत की सांस ली थी। क्योंकि चंबा वासियों के लिए हरि राय सिर्फ एक मंदिर नहीं-बल्कि सबकुछ है।