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September 11, 2026

साढ़े तीन साल बाद भी सुक्खू सरकार को नहीं मिला मंत्री, फिर अटका कैबिनेट विस्तार; 2027 बनेगी बड़ी चुनौती

दिल्ली दौरों के बाद भी राहुल गांधी से नहीं हुई मुलाकात

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cm sukhu cabinet

शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार अपने कार्यकाल के साढ़े तीन साल से ज्यादा पूरे कर चुकी है, लेकिन मंत्रिमंडल में लंबे समय से खाली चल रहा एक मंत्री पद अब भी नहीं भरा जा सका है। सरकार के गठन के बाद से ही कैबिनेट विस्तार को लेकर कई बार चर्चाएं तेज हुईं, दिल्ली में बैठकों के दौर चले और नेताओं की हाईकमान से मुलाकातें भी हुईं, लेकिन हर बार मामला किसी न किसी वजह से आगे खिसकता रहा।

 

अब एक बार फिर कैबिनेट विस्तार की उम्मीद जगी थी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू समेत प्रदेश के कई मंत्री दिल्ली पहुंचे। राजनीतिक गलियारों में इसे महज सामान्य दौरा नहीं बल्कि मंत्रिमंडल विस्तार और संगठन से जुड़े अहम फैसलों की भूमिका तैयार करने वाली कवायद के तौर पर देखा गया। लेकिन राहुल गांधी से प्रस्तावित मुलाकात नहीं हो पाई और कैबिनेट विस्तार का मामला एक बार फिर अधर में लटक गया।

 

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दिल्ली दौरे ने बढ़ाई सियासी हलचल

मंत्रियों के दिल्ली दौरे के बीच हिमाचल कांग्रेस की सियासत अचानक गर्म हो गई। वरिष्ठ नेताओं की हाईकमान के साथ मुलाकातों और प्रदेश के राजनीतिक हालात पर फीडबैक की चर्चाओं ने कई तरह के कयासों को जन्म दिया।

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सवाल अब सिर्फ एक मंत्री पद भरने का नहीं है। मिशन-2027 की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और कांग्रेस के पास सरकार तथा संगठन के बीच बेहतर तालमेल बैठाने के लिए सीमित समय बचा है। ऐसे में मंत्रियों की भूमिका, सरकार का प्रदर्शन और चुनावी रणनीति को लेकर हाईकमान का अगला कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हर बार क्यों टल जाता है कैबिनेट विस्तार?

सुक्खू सरकार के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि आखिर कैबिनेट विस्तार पर फैसला क्यों नहीं हो पा रहा? सरकार के साढ़े तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बावजूद एक मंत्री पद खाली रहना राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। कई बार संभावित नामों को लेकर अटकलें चलीं। विधायकों की दिल्ली यात्राएं हुईं। नेताओं के बीच बैठकों का दौर चला और हाईकमान तक फीडबैक भी पहुंचा, लेकिन अंतिम मुहर नहीं लग पाई।

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इस बार भी उम्मीद थी कि दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद तस्वीर साफ हो जाएगी, लेकिन राहुल गांधी से मुलाकात नहीं होने के कारण फैसला फिर टल गया। अब मंत्री पद की दौड़ में शामिल विधायकों को एक बार फिर इंतजार करना पड़ सकता है।

गारंटियों का भी चुनावी हिसाब देना होगा

कैबिनेट विस्तार से ज्यादा बड़ी चुनौती सुक्खू सरकार के सामने अब गारंटियों के वादों का हिसाब देने की है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिन गारंटियों के दम पर सत्ता हासिल की थी, उनमें से कुछ प्रमुख वादे अब भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाए हैं।

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खास तौर पर 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और महिलाओं को 1500 रुपये मासिक देने की गारंटी को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठाता रहा है। सरकार की ओर से इन योजनाओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर कदम उठाए गए हैं, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में किए गए वादों के मुकाबले तस्वीर अभी अधूरी है।

अब सिर्फ गारंटियां नहीं, उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड भी होगा अहम

सरकार के कार्यकाल का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है। ऐसे में अब जनता के सामने केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि सरकार ने क्या वादे किए थे, बल्कि यह भी बताना होगा कि उनमें से कितने पूरे हुए और कितने अभी बाकी हैं। आने वाले महीनों में सरकार के सामने विकास कार्यों को गति देने, वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन करने, कर्मचारियों के वेतन-पेंशन और दूसरी आर्थिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ जनता को अपनी उपलब्धियां दिखाने की चुनौती रहेगी।

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संगठन और सरकार में तालमेल बना सबसे बड़ा मुद्दा

कांग्रेस नेतृत्व लगातार प्रदेश में किसी भी तरह की गुटबाजी से इनकार करता रहा है, लेकिन दिल्ली में नेताओं की लगातार सक्रियता ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर हवा दी है। हाईकमान के सामने चुनौती यह भी है कि सरकार और संगठन के बीच ऐसा संतुलन कायम किया जाए, जिससे चुनाव से पहले पार्टी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर सके। मंत्रिमंडल में नया चेहरा शामिल करने का फैसला भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

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नवरात्र या दीपावली तक करना पड़ सकता है इंतजार

राहुल गांधी से मुलाकात नहीं होने और हाईकमान की अंतिम मंजूरी न मिलने के बाद अब कैबिनेट विस्तार के लिए शारदीय नवरात्र या दीपावली तक इंतजार की चर्चा तेज हो गई है। यदि ऐसा होता है तो मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे विधायकों की बेचैनी और बढ़ सकती है। वहीं, राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और कांग्रेस हाईकमान के बीच अगली बातचीत में क्या फैसला निकलता है।

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