#राजनीति
August 30, 2025
हिमाचल में सिर्फ विक्रमादित्य ही नहीं, इस मंत्री को भी विरासत में मिली है राजनीति
रोहित को दादा से मिली 'पॉलिटिकल स्कूलिंग'
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में विरासत का असर हमेशा से दिखाई देता रहा है। अगर राजनीतिक विरासत की बात करें तो अक्सर चर्चा में विक्रमादित्य सिंह का नाम सामने आता है, लेकिन वे अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें राजनीति परिवार से मिली हो। मौजूदा सरकार में एक और मंत्री भी हैं, जिनकी सियासी राह उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी रही है। दादा के पदचिह्नों पर चलते हुए आज वे भी सत्ता और संगठन में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
हम बात कर रहे हैं हिमाचल सरकार में शिक्षा मंत्री का जिम्मा संभाल रहे रोहित ठाकुर की। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के पिता भले ही राजनीति का हिस्सा ना बनें हों लेकिन उनके दादा राजनीति में बड़ा नाम थे। यही कारण है कि रोहित को राजनीति विरासत में मिली है भले ही इसकी एक कड़ी टूट चुकी हो।
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गौर करने वाली बात है कि रोहित ठाकुर के पिता जगदीश ठाकुर राजनीति में सक्रिय नहीं रहे। जगदीश ठाकुर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे ठाकुर रामलाल के बेटे हैं और रोहित उनके पोते।
रामलाल ठाकुर ने जब जान लिया कि उनके बेटे को राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उन्होंने रोहित को इसकी सीख देनी शुरू की। रोहित का जन्म 14 अगस्त 1974 में हुआ। होश संभालते ही उन्हें राजनीति समझ आने लगी।
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जुब्बल-कोटखाई का बर्थाटा इलाका सियासी गतिविधियों का बड़ा केंद्र था। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के विधायक दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। ठाकुर साहब के घर नेताओं से लेकर अफसर और आम पब्लिक का आना-जाना लगा ही रहता था।
घर पर जब इस तरह का माहौल हो तो वो छोटे से बच्चे पर कुछ ना कुछ असर तो जरूर करेगा। रोहित ठाकुर के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके बाल मन पर राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें छाप छोड़ने लगीं।
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2003 में पहली बार रोहित जुब्बल-कोटखाई से चुनावी मैदान में उतरे और विधानसभा पहुंच गए। हालांकि ये देख पाने के लिए उनके दादा इस दुनिया में नहीं थे लेकिन उनकी पॉलिटिकल स्कूलिंग हमेशा रोहित के साथ रही।
रोहित 2000 से लेकर 2004 तक प्रदेश युवा कांग्रेस की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रहे। 2002 से जुब्बल-कोटखाई से हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी से जुड़े रहे। 2008 से 2011 तक हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव पद पर रहे। 2017 में सह-चयनित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने।
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रोहित 2003 और 2012 में राज्य विधानसभा के लिए चुने गए। फिर मई 2013 से 2017 तक मुख्य संसदीय सचिव की भूमिका निभाई। 30 अक्टूबर 2021 में हुए उपचुनाव में वे तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। फिर 6 दिसंबर 2022 में चौथी बार विधायक बने।
दादा की पॉलिटिकल स्कूलिंग के चलते हॉलीलॉज गुट के साथ खट्टास होने के बावजूद उन्होंने अपनी पारिवारिक सीट पर मजबूत पकड़ बनाई और चौथी बार विधायक बने। इस जीत के बाद सुक्खू सरकार में उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई।
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ऐसे में एक चीज साफ हो जाती है कि विक्रमादित्य सिंह वो अकेले नेता नहीं हैं जिन्होंने राजनीतिक विरासत के दम पर एक मुकाम पाया हो। उनके साथी मंत्री रोहित ठाकुर भी इस लिस्ट में शामिल हैं।