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February 2, 2026

सुक्खू सरकार की अफसरशाही नहीं मान रही चुनाव आयोग के निर्देश, क्या समय पर हो पाएंगे पंचायत चुनाव

पंचायत चुनाव समय पर करवाने में अफसरशाही बन रही बाधा

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Himachal Panchyat Election

शिमला। हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई पंचायती राज चुनावों पर एक बार फिर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव संपन्न करवाए जाएंए लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। राज्य निर्वाचन आयोग के सख्त निर्देशों के बावजूद प्रदेश की अफसरशाही की कछुआ चाल ने चुनावी तैयारियों पर ब्रेक लगा दी है।

जिला उपायुक्तों ने अधिसूचित नहीं की मतदाता सूचियां

राज्य निर्वाचन आयोग ने सभी उपायुक्तों (DC) को 30 जनवरी तक मतदाता सूचियां अधिसूचित करने का अल्टीमेटम दिया था। आज 2 फरवरी हो चुकी है, लेकिन प्रदेश के 12 में से 9 जिलों के उपायुक्तों ने अभी तक सूचियां जारी नहीं की हैं। केवल शिमला, चंबा और लाहुल-स्पीति ही ऐसे जिले हैं जिन्होंने समय पर काम पूरा कर सूचियां अधिसूचित की हैं।
बाकी जिलों की इस ढुलमुल कार्यप्रणाली ने 28 फरवरी तक आरक्षण रोस्टर जारी करने और 30 अप्रैल तक चुनाव संपन्न कराने की पूरी प्रक्रिया को संकट में डाल दिया है।

 

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सिर्फ तीन जिलों ने निभाई जिम्मेदारी

जानकारी के अनुसार जिन पंचायतों और शहरी निकायों में परिसीमन या अन्य बदलाव नहीं होने हैं, वहां मतदाता सूचियां तय समय सीमा तक जारी की जानी थीं। हालांकि शिमला, चंबा और लाहुल-स्पीति जिलों ने ही इस आदेश का पालन किया है और इन जिलों में मतदाता सूचियों के 25-25 सेट छापने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके अलावा कुछ शहरी निकायों में आंशिक रूप से सूचियां जारी की गई हैं, जिनमें नगर निगम हमीरपुर और कुछ नगर पंचायतें शामिल हैं, लेकिन यह कवायद प्रदेशव्यापी चुनाव तैयारियों के लिए नाकाफी मानी जा रही है।

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तय समय पर चुनाव पर संशय

मतदाता सूचियों के अधिसूचित होने के बाद 28 फरवरी तक आरक्षण रोस्टर जारी किया जाना है, ताकि 30 अप्रैल तक पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनाव करवाए जा सकें। लेकिन अब तक सूचियां ही अधिसूचित न होने से पूरी चुनावी समय-सारिणी गड़बड़ाती दिख रही है।

अफसरशाही बनाम सिस्टम

राजनीतिक हलकों में इस देरी का सबसे बड़ा कारण प्रदेश की अफसरशाही को माना जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अधिकारी राज्य निर्वाचन आयोग और हाईकोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से नहीं ले रहे? यह पहला मौका नहीं है, जब अफसरशाही पर आदेशों की अनदेखी के आरोप लगे हों।

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सुक्खू सरकार और अफसरशाही में टकराव

सुक्खू सरकार के कार्यकाल में सरकार और अफसरशाही के बीच टकराव की खबरें कई बार सुर्खियों में रही हैं। डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री सार्वजनिक मंच से कुछ अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए कह चुके हैं कि अधिकारी अपनी खाल में रहें। वहीं, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी सोशल मीडिया पर अधिकारियों के रवैये को लेकर तीखे बयान दिए थे, जिस पर लंबे  समय तक प्रदेश की राजनीति गरमाई रही।

 

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इतना ही नहीं, हाल ही में गणतंत्र दिवस समारोह में अनुपस्थिति को लेकर मंत्री यादविंदर गोमा ने डीसी मंडी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस तक देने की बात कही थी। यह घटनाक्रम भी सरकार और प्रशासन के बीच बढ़ती खाई को उजागर करता है।

चुनाव आयुक्त भी प्रदेश से बाहर

इसी बीच राज्य निर्वाचन आयुक्त का महाराष्ट्र में एक सम्मेलन के लिए रवाना होना भी चुनावी तैयारियों को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। बताया जा रहा है कि वे करीब पांच दिन बाद हिमाचल लौटेंगे, जिससे चुनाव संबंधी प्रशासनिक गतिविधियों की रफ्तार और धीमी पड़ गई है।

 

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बड़ा सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट, राज्य निर्वाचन आयोग और खुद सरकार पंचायत चुनावों को समय पर करवाने के पक्ष में हैं, तो फिर अफसरशाही की सुस्ती क्यों आड़े आ रही है? क्या वाकई प्रदेश की अफसरशाही सरकार और संवैधानिक संस्थाओं को गंभीरता से नहीं ले रही, या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भारी पड़ने वाली है?
इन सवालों के बीच पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है।

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