पंचायत चुनावों का रास्ता साफ
इस पूरे घटनाक्रम में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की भूमिका अहम रही। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पंचायत राज संस्थाओं और शहरी निकायों के पुनर्गठन से जुड़ी सभी प्रक्रियाएं 28 फरवरी 2026 तक पूरी की जाएं।
HC की भूमिका रही अहम
इसके बाद आठ सप्ताह के भीतर चुनाव कराए जाने की समय-सीमा भी तय की गई थी। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद राज्य सरकार और संबंधित विभागों पर प्रक्रिया तेज करने का दबाव बढ़ा।
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सुप्रीम कोर्ट का भी स्पष्ट निर्देश
मामला आगे बढ़ते हुए दिल्ली सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। शीर्ष अदालत ने 13 फरवरी, 2026 को SLP पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि स्टेट इलेक्शन कमीशन, पंचायती राज विभाग, शहरी विकास विभाग और SDMA मिलकर लंबित प्रक्रियाएं 31 मार्च 2026 तक पूरी करें।
31 मई तक चुनाव
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 31 मई, 2026 तक चुनाव प्रक्रिया हर हाल में संपन्न कर ली जानी चाहिए। अदालत के इस स्पष्ट निर्देश के बाद राज्य सरकार के पास चुनाव टालने का विकल्प लगभग समाप्त हो गया था।
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मुख्य सचिव की ओर से आदेश जारी
ताजा आदेश मुख्य सचिव संजय गुप्ता की ओर से जारी किया गया है। आदेश में साफ कहा गया है कि पूर्व में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत लगाया गया प्रतिबंध अब प्रभावी नहीं रहेगा। इसके साथ ही पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराने की प्रशासनिक तैयारियों को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
सिस्टम को लेकर उठे सवाल
चुनाव टलने के कारण प्रदेश की सभी पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए गए थे। पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो चुका था, जबकि 47 से अधिक शहरी निकायों में जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल 17 जनवरी को खत्म हुआ। इसके बाद प्रशासनिक व्यवस्था संभालने के लिए एडमिनिस्ट्रेटर लगाए गए।
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सरकार पर चुनाव टालने का आरोप
लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक प्रशासक के जरिए काम चलाना राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस का विषय बन गया था। विपक्षी दल लगातार सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगा रहे थे, जबकि सरकार प्राकृतिक आपदा और कनेक्टिविटी बाधित होने का हवाला दे रही थी।
अब क्या होगा आगे?
सरकार द्वारा प्रतिबंध हटाए जाने के बाद अब सबसे अहम जिम्मेदारी स्टेट इलेक्शन कमीशन पर आ गई है। मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन, वार्डों का पुनर्गठन, आरक्षण प्रक्रिया और चुनाव कार्यक्रम की घोषणा जैसे कदम तेजी से उठाए जाने की संभावना है।
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चुनाव की तैयारियां तेज
राजनीतिक दलों ने भी जमीनी स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। पंचायत स्तर पर संभावित उम्मीदवार सक्रिय हो गए हैं और गांव-गांव बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की आड़ में टले चुनाव अब अदालतों की निगरानी में समयबद्ध तरीके से कराए जाने की दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। आने वाले दो से तीन महीने प्रदेश की स्थानीय राजनीति के लिए बेहद अहम साबित होंगे।



