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January 27, 2026
सुक्खु सरकार का व्यवस्था परिवर्तन: पहली बार प्रशासन संभालेगा पंचायतें, 5 करोड़ होगा फायदा
पंचायत चुनाव समय पर ना होने से वित्त आयोग की ग्रांट पर मंडराया खतरा
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हो रहा है जब गांव की सरकार प्रशासन के हवाले होगी। पहली बार ऐसा होगा जब प्रदेश की सभी 3577 पंचायतों में जनता द्वारा चुनी गई सरकार की जगह प्रशासनिक व्यवस्था कामकाज संभालेगी। पांच साल का कार्यकाल पूरा होते ही प्रदेश की तमाम पंचायतें स्वतः भंग हो जाएंगी और गांवों के विकास से जुड़े फैसले सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक लेंगे।
दरअसल मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो रहा है। समय रहते चुनाव न होने की वजह से सुक्खू सरकार को पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने की दिशा में कदम उठाना पड़ा है। सरकार ने आपदा की स्थिति का हवाला देते हुए पंचायत चुनाव तय समय पर नहीं कराए, जिससे यह असाधारण हालात बने।
पंचायतों के भंग होते ही प्रधान, उपप्रधान, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति और जिला परिषद के सभी सदस्य पदमुक्त हो जाएंगे। इसके बाद गांवों में विकास कार्यों की मंजूरी, भुगतान, योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रशासनिक फैसले सीधे एडमिनिस्ट्रेटर के अधीन होंगे। यानी फिलहाल ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी ठहर जाएगी।
कार्यकाल पूरा होने के बाद पंचायतों की कमान संभालने के लिए पंचायतीराज विभाग ने सरकार को दो प्रस्ताव भेजे हैं। पहले प्रस्ताव में पंचायत सचिव को कमान सौंपे जाने की बात कही गई है। जबकि दूसरे प्रस्ताव में तीन सदस्यीय समिति बनाने का सुझाव दिया गया है। प्रस्ताव में क्षेत्र के स्कूल के प्रिंसिपल या हेडमास्टर को प्रशासक बनाने और ग्राम रोजगार सेवक व पंचायत सचिव को सदस्य बनाए जाने का सुझाव दिया गया है। इन दोनों सुझावों पर पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने कहा है कि जल्द ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से चर्चा के बाद अगले कुछ दिनों में इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।
इस प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे बड़ा असर पंचायतों की आर्थिक सेहत पर पड़ेगा। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार निर्वाचित पंचायत न होने की स्थिति में वित्त आयोग की ग्रांट नहीं मिलती। मौजूदा वित्त वर्ष में हिमाचल को करीब 171 करोड़ रुपए की राशि मिल चुकी है, लेकिन 31 मार्च के बाद चुनाव नहीं हुए तो आगे मिलने वाली ग्रांट पर रोक लग सकती है। इसके बाद लागू होने वाले 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर भी अनिश्चितता बनी रहेगी।
प्रदेश की पंचायतों में करीब 30 हजार जनप्रतिनिधि हैं, जिनमें से वार्ड सदस्यों को छोड़ अन्य प्रतिनिधियों के मानदेय पर सरकार हर महीने लगभग 5 करोड़ रुपए खर्च करती है। पंचायतों के भंग होने के बाद यह राशि बचेगी। हालांकि, यह बचत वित्त आयोग की ग्रांट के मुकाबले बहुत छोटी है, क्योंकि वही राशि गांवों के विकास की रीढ़ मानी जाती है।
बताया जा रहा है कि राज्य निर्वाचन आयोग दिसंबर में पंचायत और नगर निकाय चुनाव एक साथ कराने की तैयारी में था। लेकिन सरकार की ओर से आपदा का हवाला दिए जाने के बाद चुनाव टाल दिए गए। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां जनहित याचिका पर अदालत ने 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराने के आदेश दिए हैं। तय समय पर चुनाव न होने के कारण ही अब यह प्रशासनिक व्यवस्था लागू करनी पड़ रही है, जिसे लोकतंत्र के लिहाज से अस्थायी और मजबूरी भरा कदम माना जा रहा है।
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गौरतलब है कि पंचायतों से पहले प्रदेश के 47 नगर निकायों में भी सरकार पहले ही एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर चुकी है। ऐसे में साफ है कि हिमाचल में फिलहाल ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर लोकतांत्रिक संस्थाएं प्रशासनिक नियंत्रण में जा रही हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पंचायत चुनाव कब तक कराए जाते हैं और कब गांवों को दोबारा चुनी हुई सरकार मिलती है।