#विविध
March 8, 2026
हिमाचल की निर्मला को सलाम : 3 रुपये में काम कर पढ़ाए बच्चे, दोनों ने पाई सरकारी नौकरी
एक बेटे का हुआ निधन, बीमारी के कारण पति का छूटा काम
शेयर करें:

सिरमौर। हिमाचल प्रदेश में कई महिलाएं ऐसी हैं- जो दूसरों के लिए प्रेरणा साबित हो रही हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम आपको सिरमौर जिले के नाहन क्षेत्र की रहने वाली ऐसी ही एक महिला के बारे बताएंगे।
कटोला गांव की रहने वाली निर्मला देवी की जिंदगी संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है- जो हर किसी को प्रेरित करती है। जीवन में एक के बाद एक आई कठिन परिस्थितियों ने उन्हें कई बार परखा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
बेटे की असमय मौत, पति की लंबी बीमारी और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हिम्मत जुटाई और अपने परिवार को संभालते हुए बच्चों को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया। आज उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर हौसला मजबूत हो तो विपरीत हालात भी इंसान के इरादों को नहीं तोड़ सकते।
निर्मला देवी का विवाह वर्ष 1989 में राम गोपाल के साथ हुआ था। शादी के बाद उन्होंने एक सामान्य ग्रामीण परिवार की तरह जिम्मेदारियों भरा जीवन शुरू किया। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। उनके पति मिस्त्री का काम करते थे और उसी कमाई से घर का खर्च चलता था।
समय बीतने के साथ परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ी और जिम्मेदारियां भी बढ़ती चली गईं। सीमित आमदनी में घर चलाना आसान नहीं था, लेकिन निर्मला देवी ने कभी परिस्थितियों से घबराकर पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने धैर्य और समझदारी के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को निभाया।
साल 2000 में उनके जीवन में एक ऐसा हादसा हुआ जिसने पूरे परिवार को अंदर तक हिला दिया। उनके एक बेटे की करंट लगने से अचानक मौत हो गई। एक मां के लिए यह दर्द असहनीय था। बेटे की मौत ने निर्मला देवी को गहरे सदमे में डाल दिया।
कुछ समय तक वह मानसिक रूप से टूट गईं, लेकिन बाकी बच्चों का भविष्य उनके सामने था। उन्होंने खुद को संभाला और यह ठान लिया कि किसी भी हालत में बच्चों की जिंदगी प्रभावित नहीं होने देंगी।
बेटे की मौत के बाद परिवार पर दुखों का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। कुछ समय बाद उनके पति गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और लंबे समय तक बिस्तर पर ही रहने लगे। ऐसे में घर की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई।
घर में कमाने वाला कोई नहीं था और जिम्मेदारियों का पूरा बोझ निर्मला देवी के कंधों पर आ गया। पति के इलाज का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और घर के रोजमर्रा के खर्च-सब कुछ संभालना उनके लिए बेहद कठिन था। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और खुद ही परिवार का सहारा बनने का फैसला किया।
आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए निर्मला देवी ने नाहन में सिलाई का काम सीखना शुरू किया। शुरुआत बहुत छोटी थी, लेकिन उनके इरादे बड़े थे। वर्ष 2001 में उन्होंने चुन्नी की पिको लगाने का काम शुरू किया, जिसके बदले उन्हें सिर्फ तीन रुपये मिलते थे।
कम कमाई के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। दिन-रात मेहनत करके धीरे-धीरे अपने काम को आगे बढ़ाया और परिवार की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश जारी रखी। लगातार मेहनत और लगन का परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2002 में उन्होंने सैनवाला में सिलाई की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। यह कदम उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।
हालांकि, उस समय बच्चे भी छोटे थे और जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा थीं, लेकिन उन्होंने कभी बच्चों की पढ़ाई को बीच में नहीं आने दिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बच्चों को शिक्षा दिलाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
निर्मला देवी की मेहनत और त्याग का फल आज उनके बच्चों की सफलता के रूप में दिखाई देता है। उनकी बड़ी बेटी भावना ने वर्ष 2014 में शास्त्री की पढ़ाई पूरी की और आज वह सरकारी अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं। उनके बेटे संदीप ने भी शास्त्री की पढ़ाई करने के बाद HRTC में परिचालक के पद पर नौकरी हासिल की।
वहीं, उनकी दूसरी बेटी ने नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर अपने करियर की दिशा तय की। निर्मला देवी ने अपने पति के साथ मिलकर बड़े बेटे और बेटी की शादी भी करवाई। अब पति की सेहत में सुधार होने के बाद वे एक छोटी परचून की दुकान चला रहे हैं और परिवार धीरे-धीरे स्थिर जीवन की ओर बढ़ रहा है।
निर्मला देवी का मानना है कि जीवन में कठिनाइयां हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन उनसे डरकर हार मान लेना समाधान नहीं है। उनका कहना है कि जब परिवार की जिम्मेदारी सामने होती है तो इंसान के अंदर खुद-ब-खुद हिम्मत आ जाती है।
वे बताती हैं कि जिंदगी में कई ऐसे पल आए जब लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है, लेकिन बच्चों के भविष्य की सोचकर उन्होंने खुद को संभाला। मेहनत और धैर्य के साथ धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलती चली गईं।
निर्मला देवी का कहना है कि अगर महिलाएं ठान लें तो वे किसी भी परिस्थिति में अपने परिवार को संभाल सकती हैं और समाज में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। आज उनकी संघर्ष भरी यह कहानी न केवल सिरमौर जिले बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन गई है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने परिवार और सपनों को संजोकर आगे बढ़ने का हौसला रखती हैं।