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May 31, 2026

हिमाचल : मानसून में हुए बेघर, बच्चों-बुजुर्गों संग तबुओं में रह रहे 21 परिवार; एक साल बाद भी नहीं मिला ठिकाना

मानसून के जख्म हरे, लोगों को सता रहा बारिश का डर

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मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पिछले मानसून की तबाही के निशान आज भी साफ दिखाई देते हैं। बालीचौकी उपमंडल के भेला गांव में आज भी पड़ी दरारें, धंसी सड़कें, टूटे डंगे और नालों में मलबा जमा है।

मानसून से पहले परेशान लोग

गांव के हालात इस बात की गवाही दे रहे हैं कि प्राकृतिक आपदा के बाद स्थायी समाधान अब तक धरातल पर नहीं उतर पाया है। गांव के लोगों का कहना है कि बीते वर्ष आई आपदा ने उनका सब कुछ छीन लिया, लेकिन एक साल बाद भी हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।

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पिछले साल हुआ भारी नुकसान

मंडी मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में पिछले साल मानसून के दौरान हुए भारी नुकसान ने 21 परिवारों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी थी। कई घर जमींदोज हो गए, कृषि भूमि प्रभावित हुई और वर्षों की मेहनत से बनाई गई संपत्ति मलबे में तब्दील हो गई।

21 परिवारों की बदली जिदंगी

इन 21 प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत तो मिली, लेकिन स्थायी पुनर्वास का इंतजार अब भी जारी है। आज भी कई परिवार अस्थायी तंबुओं में रहने को मजबूर हैं। सर्दियों में इन्हीं तंबुओं ने ठंड के थपेड़े झेले और अब बढ़ती गर्मी ने इन्हें तपते हुए कमरों में बदल दिया है।

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आपदा के जख्म आज भी ताजा

गांव में प्रवेश करते ही आपदा के जख्म नजर आने लगते हैं। कई स्थानों पर सड़कें धंस चुकी हैं, जबकि पहाड़ियों की ढलानें अब भी अस्थिर दिखाई देती हैं। स्थानीय लोगों के मन में सबसे बड़ी चिंता आने वाले मानसून को लेकर है।

बरसात में सब कुछ बहा

71 वर्षीय प्रेमला देवी ने बताया कि पिछले वर्ष बरसात में सब कुछ बह गया था। उस समय उम्मीद थी कि कुछ महीनों में हालात सामान्य हो जाएंगे, लेकिन अब लगभग एक साल बीतने को है और स्थायी घर का सपना अभी भी अधूरा है। उनके अनुसार अगला मानसून नजदीक है और आज भी उनके पास सुरक्षित आशियाना नहीं है।

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तंबुओं में रहना मुश्किल

वहीं, पुन्नी देवी बताती हैं कि सर्दियों की रातें किसी परीक्षा से कम नहीं थीं। अब गर्मी के मौसम में तंबुओं में रहना बेहद कठिन हो गया है। छोटे बच्चे दिनभर बाहर पेड़ों की छांव तलाशते रहते हैं क्योंकि दोपहर के समय तंबू के भीतर तापमान असहनीय हो जाता है।

रहने के लिए देनी चाहिए जगह

गांव के युवक नोख सिंह का कहना है कि केवल आर्थिक सहायता समस्या का समाधान नहीं है। उनका सवाल है कि जब घर बनाने के लिए सुरक्षित जमीन ही उपलब्ध नहीं है तो मुआवजे की राशि का उपयोग कैसे किया जाए। उनका मानना है कि प्रभावित परिवारों को सबसे पहले सुरक्षित पुनर्वास स्थल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

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क्या बोला प्रशासन?

दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि आगामी मानसून को देखते हुए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। DC मंडी अपूर्व देवगन के अनुसार जिला मुख्यालय में विभिन्न विभागों के साथ कार्यशालाएं आयोजित की गई हैं, जिनमें आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया और समन्वय को लेकर विस्तृत चर्चा की गई है।

अलर्ट पर सभी विभाग

सभी विभागों को अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं। पिछले मानसून में क्षतिग्रस्त हुई सड़कों और रास्तों को अस्थायी तथा स्थायी रूप से बहाल करने का कार्य किया गया है, जबकि शेष कार्यों को भी चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि पिछली परिस्थितियों से सीख लेते हुए इस बार अधिक मजबूत तैयारी की जा रही है।

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सरकार से ग्रामीणों को उम्मीदें

हालांकि भेला गांव के प्रभावित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है- क्या इस बार मानसून आने से पहले उन्हें स्थायी छत मिल पाएगी या फिर एक और बरसात तंबुओं में ही गुजारनी पड़ेगी। गांव के लोगों की निगाहें अब राहत घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों पर टिकी हैं।

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