#विविध
January 13, 2026
हिमाचल के गांव ने पेश की मिसाल : अब शादियों में नहीं छलकेंगे जाम, एक ही दिन बजेगा DJ- दिखावे पर लगाम
कर्ज के बोझ तले दब रहे परिवार- फिजूलखर्ची पर लगेगी रोक
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सिरमौर। बदलते दौर में शादियां और सामाजिक आयोजन अब सिर्फ खुशियों का मौका नहीं रह गए हैं- बल्कि आम परिवारों के लिए भारी आर्थिक दबाव भी बनते जा रहे हैं। समाज में बढ़ते दिखावे की प्रवृत्ति ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कई बार लोग अपनी बजट से कहीं ज्यादा खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।
कहीं कर्ज लिया जाता है, तो कहीं पुश्तैनी जमीन तक बेचनी पड़ जाती है। इसी सामाजिक और आर्थिक चुनौती को समझते हुए सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र के टौरू गांव ने सामूहिक रूप से ऐसे फैसले लिए हैं, जो न सिर्फ खर्च कम करेंगे बल्कि समाज को नई दिशा भी देंगे।
टौरू गांव के लोगों ने आपसी सहमति से यह तय किया कि अब बच्चे के जन्म से लेकर शादी और मृत्यु भोज जैसे आयोजनों में फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाएगी। गांव के लोगों का कहना है कि इन फैसलों का मकसद किसी परंपरा को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे सादगी और समानता के साथ निभाना है।
उनका मानना है कि सामाजिक रस्में खुशी बांटने के लिए होती हैं, न कि किसी परिवार को कर्ज के बोझ तले दबाने के लिए। अब तक टौरू गांव में शादियां पांच दिनों तक चलती थीं। अलग-अलग रस्मों के लिए अलग-अलग भोज होते थे, जिनमें सैकड़ों लोग शामिल होते थे।
पलटोज पार्टी में तो हालात यह होते थे कि गांव की शादीशुदा बेटियां अपने बच्चों सहित पहुंचती थीं और संख्या हजार के पार चली जाती थी। बाहर से आने वाले रिश्तेदारों को जोड़ दिया जाए तो मेहमानों की गिनती डेढ़ हजार से ज्यादा हो जाती थी।
अब फैसला लिया गया है कि पलटोज पार्टी केवल बेड़े तक सीमित रहेगी। यानी केवल नजदीकी परिवार और गांव के कुछ प्रमुख लोग ही इसमें शामिल होंगे। इससे न सिर्फ खर्च घटेगा, बल्कि आयोजन भी व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रहेगा।
गांव में शादी-विवाह के दौरान शराब परोसने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। इसके साथ ही गांव में शराब की बिक्री पर भी रोक रहेगी। डीजे सिर्फ एक दिन ही बजेगा, जिससे शोर-शराबे और अनावश्यक खर्च दोनों पर अंकुश लगेगा।
महिलाओं को घी, शक्कर, चीनी, सिक्के, कपड़े या बर्तन देने जैसी परंपराएं भी अब समाप्त कर दी गई हैं। इसके अलावा, शादी में दिन के टोलूवा के रूप में महिलाओं और पुरुषों को बकरा देने की प्रथा भी खत्म कर दी गई है, जो लंबे समय से आर्थिक बोझ का कारण बनती रही थी।
दसूठन की परंपरा को लेकर भी बड़ा निर्णय लिया गया है। अब यह कार्यक्रम केवल बड़े पुत्र के जन्म पर ही किया जाएगा और उसमें भी सिर्फ चार-पांच नजदीकी परिवारों को आमंत्रित किया जाएगा। पुत्र या पुत्री के जन्म पर बड़े आयोजन करने की परंपरा अब नहीं रहेगी।
मृत्यु के बाद होने वाले शोक, तेरहवीं और बरसी जैसे कार्यक्रम भी बेड़े तक सीमित रहेंगे। शोकाकुल परिवार के अलावा केवल दो-तीन करीबी लोग ही शामिल होंगे, जिससे दुख की घड़ी में परिवार पर अतिरिक्त खर्च और सामाजिक दबाव नहीं पड़ेगा।
ग्रामीणों के अनुसार पहले एक शादी पर औसतन 10 से 15 लाख रुपये तक खर्च हो जाता था। यदि साल में केवल 10 शादियां भी होती थीं, तो कुल खर्च डेढ़ करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाता था। नए नियम लागू होने के बाद अनुमान है कि एक शादी पर खर्च घटकर करीब पांच लाख रुपये रह जाएगा।
इस तरह गांव में हर साल एक करोड़ रुपये से अधिक की सीधी बचत संभव होगी। यह बचत सिर्फ पैसों की नहीं होगी, बल्कि लोगों को मानसिक सुकून भी मिलेगा कि वे समाज के डर या दिखावे के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार आयोजन कर सकते हैं।
टौरू गांव से पहले शिलाई तहसील के द्राबिल गांव में भी इसी तरह की पहल की गई थी, जहां भोज को एक दिन तक सीमित किया गया। अब टौरू गांव का यह कदम पूरे गिरिपार क्षेत्र के लिए मिसाल बन रहा है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी इस पहल से आसपास के गांव भी प्रेरणा लेंगे और सामाजिक आयोजनों को सादगी, समानता और सम्मान के साथ मनाने की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।