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November 25, 2025
हिमाचल : सिर्फ दो किस्तें ना मिली, महिंद्रा ने बिना पूछे बेच दी गाड़ी- अब शख्स को चुकाएगी लाखों रुपये
अपने गुजारे के लिए खरीदी थी शख्श ने गाड़ी
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कांगड़ा। अपने रोजगार के लिए लिया गया वाहन, बीमारी के चलते चूकी दो किस्तें और फिर कंपनी द्वारा बिना सहमति वाहन को उठाकर बेच देना-फतेहपुर निवासी एक व्यक्ति के लिए यह गलती बेहद महंगी साबित हुई।
मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा तो पूरी तस्वीर साफ हुई। अब आयोग ने वाहन लोन देने वाली महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज को कठोर आदेश जारी किए हैं और पीड़ित उपभोक्ता को 78,401 रुपये, ब्याज सहित चुकाने का निर्देश दिया है। इसके अलावा कंपनी को 30,000 रुपये मुआवजा और 15,000 रुपये मुकदमे का खर्च भी देना होगा।
उपभोक्ता आयोग, धर्मशाला की खंडपीठ अध्यक्ष हेमांशु मिश्रा, सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुरने कंपनी को स्पष्ट रूप से कहा है कि शिकायतकर्ता को 78,401 रुपये शिकायत की तारीख से वसूली तक 12% वार्षिक ब्याज सहित दिए जाएं।
भुगतान के बाद कंपनी चाहे तो वह राशि उस व्यक्ति से वसूल सकती है, जिसे वाहन बेचा गया था। भुगतान हो जाने के बाद यह सुनिश्चित किया जाए कि वाहन का पंजीकरण नए खरीदार के नाम पर स्थानांतरित कर दिया जाए, ताकि शिकायतकर्ता पर आगे कोई कर या देनदारी न बचे। यह फैसला उन मामलों में एक अहम मिसाल माना जा रहा है, जहां वित्तीय कंपनियां बिना उपभोक्ता की सहमति वाहनों की हिलावट कर लेती हैं।
जरनैल सिंह, निवासी ब्रेल (फतेहपुर, जिला कांगड़ा), ने 14 मई 2011 को 5,13,000 रुपये में एक वाणिज्यिक वाहन खरीदा था। स्वरोजगार ही उनका मुख्य साधन था। वाहन खरीदने के लिए उन्होंने 4,13,000 रुपये महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंस से उधार लिए थे, जिसे 60 मासिक किस्तों में चुकाना था।
जरनैल सिंह ने 2011 से 2016 तक सभी किस्तें समय पर भरीं। लेकिन 2016 में गंभीर बीमारी के कारण वे केवल दो किस्तें नहीं चुका पाए। यहीं से विवाद शुरू हुआ। कंपनी ने जुलाई 2016 में बिना किसी पूर्व सूचना या लिखित सहमति के शिकायतकर्ता का वाहन जब्त कर लिया। इतना ही नहीं, वाहन को किसी तीसरे व्यक्ति को बेच भी दिया।
जब शिकायतकर्ता ने विरोध जताया, तो उसे कंपनी की ओर से बताया गया कि वाहन बेचा जा चुका है और ऋण खाते में अभी भी 1,25,000 रुपये बकाया हैं। मजबूरी में शिकायतकर्ता ने यह राशि भी जमा कर दी।
वाहन बेचने के बावजूद कंपनी ने शिकायतकर्ता को एनओसी देने में टाल-मटोल शुरू कर दी। 2018 में कंपनी ने एक पत्र जरूर भेजा, जिसे शिकायतकर्ता अशिक्षित होने के कारण NOC समझ बैठा। लेकिन असली झटका तब लगा जब 7 जून 2022 को पंजीकरण एवं लाइसेंसिंग प्राधिकारी, जवाली की ओर से 25,776 रुपये के बकाया कर का नोटिस आया।
जांच करने पर पता चला पंजीकरण अधिकारी जवाली को अभी भी 31,000 रुपये देय थे।आबकारी आयुक्त विभाग, पालमपुर को 20,200 रुपये कर बनता था और सबसे चौंकाने वाली बात वाहन अभी भी जरनैल सिंह के नाम पर ही दर्ज था।
इससे स्पष्ट हो गया कि कंपनी ने न केवल वाहन बिना सहमति बेचा बल्कि पंजीकरण हस्तांतरण की प्रक्रिया भी पूरी नहीं करवाई, जिससे सभी कर और कानूनी जिम्मेदारियां अब भी उपभोक्ता के सिर पर थीं।
जरनैल सिंह ने “सेवा में कमी” और “अनुचित व्यापार व्यवहार” का आरोप लगाते हुए मामला उपभोक्ता आयोग में दायर किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आयोग ने माना कि कंपनी ने वाहन की जब्ती और बिक्री में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
वाहन बेचने के बावजूद पंजीकरण ट्रांसफर नहीं कराया, जिससे शिकायतकर्ता पर कर बकाया चढ़ता गया। शिकायतकर्ता से अनावश्यक रूप से 1,25,000 रुपये की अतिरिक्त वसूली करवाई गई। इसी आधार पर आयोग ने पूरी राशि, मुआवजा और ब्याज सहित भुगतान का आदेश पारित किया।
इस मामले में आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि: