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January 9, 2026
हिमाचल में नकली बर्फ जमा कर सेब को बचा रहे बागवान, एक्सपर्ट बोले- ये जुगाड़ ठीक नहीं
बर्फबारी ना होने के कारण फसलों को लेकर चिंता में बागवान
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में इस बार सर्दियों का मिजाज पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है। लंबे समय से मौसम की बेरुखी के चलते न तो अच्छी बारिश हुई है और न ही ऊंचाई वाले इलाकों को छोड़कर हिमपात देखने को मिला है।
इसका सीधा असर प्रदेश की सेब बागवानी पर पड़ रहा है। खासकर शिमला जिले के निचले और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की फसल के लिए जरूरी चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जिससे बागवानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
सेब की अच्छी पैदावार के लिए पौधों का सही समय तक ठंडे तापमान में रहना बेहद जरूरी होता है। इसी प्रक्रिया को चिलिंग ऑवर्स कहा जाता है। लेकिन इस बार बीते करीब तीन महीनों से प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश और बर्फबारी न के बराबर हुई है।
नतीजन सेब के पौधे अब तक पूरी तरह सुप्तावस्था (डोरमेंसी) में नहीं जा पाए हैं। बागवानों को डर सता रहा है कि अगर समय रहते चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं हुए तो आने वाले मौसम में फूल और फलन पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।
मौसम की मार से परेशान कुछ बागवान अब चिलिंग ऑवर्स पूरे करने के लिए अलग-अलग प्रयोग करने लगे हैं। शिमला जिले के ठियोग, कोटखाई और आसपास के क्षेत्रों में कई बागवान रात के समय सेब के पौधों पर कृत्रिम रूप से बर्फ जमाने का प्रयास कर रहे हैं।
उनका मानना है कि इससे पौधों को ठंड का अहसास होगा और चिलिंग ऑवर्स की कमी कुछ हद तक पूरी की जा सकेगी। हालांकि यह तरीका वैज्ञानिक रूप से कितना कारगर है, इस पर अभी सवाल बने हुए हैं।
वर्षा और हिमपात न होने से सिर्फ चिलिंग ऑवर्स ही नहीं, बल्कि बागीचों के अन्य जरूरी काम भी प्रभावित हुए हैं। बागवानों ने भले ही प्रूनिंग (कटाई-छंटाई) का काम शुरू कर दिया हो, लेकिन खाद डालने, पौधों के चारों ओर गुड़ाई करने, तौलिए बनाने और नए पौधों के लिए गड्ढे खोदने जैसे कार्य अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो पाए हैं। जमीन में नमी बेहद कम होने के कारण ये सभी काम बाधित हैं, जिससे आने वाले सीजन की तैयारियों पर भी असर पड़ रहा है।
सेब के पौधों के लिए चिलिंग ऑवर्स बेहद अहम माने जाते हैं। रायल किस्म के सेब के लिए करीब 800 से 1000 चिलिंग ऑवर्स की आवश्यकता होती है, जबकि अर्ली वैरायटी के पौधों के लिए 600 से 800 चिलिंग ऑवर्स जरूरी माने जाते हैं। इसके अलावा स्टोन फ्रूट की बात करें तो चेरी को लगभग 500, आड़ू को 300 से 400, जबकि खुमानी और प्लम को इससे भी कम चिलिंग ऑवर्स की जरूरत होती है। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो पौधों का विकास प्रभावित हो सकता है।
कृत्रिम बर्फ जमाने के लिए बागवान रात के समय का सहारा ले रहे हैं। जब तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे पहुंचता है, तो वे स्प्रिंकलर या पाइप के माध्यम से सेब की टहनियों पर लगातार पानी छोड़ते हैं। रात के ठंडे तापमान में यह पानी जमकर टहनियों पर बर्फ की परत बना लेता है। यह प्रक्रिया कई घंटों तक जारी रखी जाती है, जिससे पौधों पर अस्थायी रूप से बर्फ जमी रहती है।
बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज का कहना है कि सेब के पौधों पर इस तरह कृत्रिम रूप से बर्फ जमाने के तरीकों पर पहले कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि यह तरीका फायदेमंद होगा या नुकसानदायक। उन्होंने आशंका जताई कि इससे पौधों के कोमल हिस्सों और नई कलिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार चिलिंग ऑवर्स पूरे करने के लिए दिन का औसत तापमान सात डिग्री सेल्सियस से कम होना चाहिए। लेकिन कृत्रिम बर्फ जमाने से टहनियों का तापमान अचानक बहुत नीचे चला जाता है, जबकि आसपास का वातावरण अपेक्षाकृत गर्म बना रहता है। इस तापमान असंतुलन से पौधों की प्राकृतिक वृद्धि प्रक्रिया बाधित हो सकती है और इसका असर आने वाली फसल पर भी पड़ सकता है।
कृत्रिम बर्फ जमाने की प्रक्रिया में पानी, बिजली और संसाधनों का अधिक इस्तेमाल होता है। ऐसे में यदि यह प्रयोग सफल नहीं रहा, तो बागवानों को आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। पहले ही मौसम की मार से परेशान बागवान अब जोखिम भरे प्रयोग करने को मजबूर हैं।
बागवानों की नजर अब आसमान पर टिकी हुई है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होगा और प्रदेश में बारिश व बर्फबारी देखने को मिलेगी, जिससे प्राकृतिक रूप से चिलिंग ऑवर्स पूरे हो सकें। फिलहाल मौसम की बेरुखी ने हिमाचल की सेब बागवानी के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं और आने वाला सीजन बागवानों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं दिख रहा।