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January 7, 2026
हाईकोर्ट में सुक्खू सरकार की फिर हुई फजीहत... इस बार 50 हजार की लगाई कॉस्ट, जानें क्यों
एमसी शिमला मेयर कार्यकाल बढ़ाने की याचिका पर हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर न्यायिक सवाल खड़े हुए हैं। हिमाचल हाईकोर्ट, जो पहले भी सरकार के कई फैसलों पर सख्त टिप्पणियां कर चुका है, इस बार एक कदम आगे बढ़ते हुए सीधे आर्थिक दंड तक पहुंच गया। जवाब में देरी और लापरवाही को लेकर अदालत ने सरकार पर जुर्माना लगाकर साफ संकेत दिया है कि प्रशासनिक चूक अब केवल टिप्पणी तक सीमित नहीं रहेगी। इस आदेश के साथ ही एक बार फिर हाईकोर्ट की चौखट पर सुक्खू सरकार की फजीहत सार्वजनिक बहस का विषय बन गई है।
दरअसल हिमाचल हाईकोर्ट एक बार फिर सुक्खू सरकार के लिए सख्त संदेश लेकर सामने आया है। नगर निगम शिमला के मेयर का कार्यकाल बढ़ाने के मामले में अदालत ने न केवल सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए, बल्कि जवाब में देरी को लेकर 50 हजार रुपये की कंडीशनल कॉस्ट भी ठोक दी।
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शिमला नगर निगम के महापौर का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर जारी अध्यादेश और बाद में लाए गए संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हिमाचल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की लापरवाही पर नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति जियालाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि समय की गंभीरता के बावजूद सरकार अब तक अपने जवाब को ठीक से पेश नहीं कर पाई है।
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अदालत ने दो दिनों के भीतर सभी लंबित आपत्तियों का स्पष्ट और संशोधित जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। तय समय सीमा में जवाब दाखिल न करने की स्थिति में राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये की कंडीशनल कॉस्ट लगाने का आदेश दिया गया है।
यह पहला मौका नहीं है जब सुक्खू सरकार को हाईकोर्ट की सख्ती का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले भी प्रशासनिक फैसलों, अध्यादेशों और नीतिगत निर्णयों को लेकर अदालत सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा चुकी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बिना ठोस तैयारी और समयबद्ध जवाब के मामलों को अदालत में ले जाना सरकार के लिए लगातार परेशानी का सबब बन रहा है।
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याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शिमला नगर निगम के मेयर सुरेंद्र चौहान का कार्यकाल 14 नवंबर 2025 को ही समाप्त हो चुका है। अधिवक्ता सुधीर ठाकुर ने कहा कि अध्यादेश की वैधानिक अवधि खत्म हो चुकी है और विधानसभा में पेश किए जाने के 42 दिन बाद वह स्वतः समाप्त हो जाता है। ऐसे में मेयर का कार्यकाल बढ़ाने के लिए फिलहाल कोई वैध कानून मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शहर विकास विभाग पहले ही चुनाव कराने को लेकर नोटिस जारी कर चुका है, ऐसे में चुनाव टालने का कोई आधार नहीं बचता।
वहीं राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि मेयर का कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश तय समय सीमा में विधानसभा के समक्ष रखा गया था और बाद में नया संशोधित विधेयक भी पारित हो चुका है। सरकार का दावा है कि अब केवल राज्यपाल की मंजूरी बाकी है और मौजूदा याचिका अप्रासंगिक हो चुकी है। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब तक राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिलती, तब तक कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं माना जा सकता।
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हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी तय की है। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि देरी और आधे.अधूरे जवाब अब स्वीकार नहीं किए जाएंगे। इस आदेश को सुक्खू सरकार के लिए एक और चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है कि अदालत की गंभीरता को हल्के में लेने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। बता दें कि मेयर कार्यकाल विवाद ने एक बार फिर सुक्खू सरकार को न्यायिक कटघरे में खड़ा कर दिया है। हाईकोर्ट की सख्ती और 50 हजार की कंडीशनल कॉस्ट यह बताने के लिए काफी है कि राज्य की शीर्ष अदालत सरकार के फैसलों और जवाबदेही को लेकर अब कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है।