#विविध
January 6, 2026
अपने बड़े भाई "पंजाब" को बड़ा झटका देने जा रहा हिमाचल, सुक्खू सरकार वसूलेगी करोड़ों रुपए
BBMB और प्रभावित राज्य कोर्ट का करेंगे रूख!
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शिमला। हिमाचल की नदियों पर बने बिजलीघर एक बार फिर सियासी और संवैधानिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। जल सेस को अदालत से झटका लगने के बाद अब सुक्खू सरकार ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स पर नया रास्ता चुना है। इस बार नाम बदला है, लेकिन असर पहले से ज्यादा बड़ा है। भूमि मालिया सेस के जरिए हिमाचल सरकार ने न सिर्फ अपने इरादे साफ किए हैं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के साथ एक नई टकराव की जमीन भी तैयार कर दी है।
मार्च 2023 में हिमाचल सरकार ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स पर जल सेस लगाया था। उस फैसले को पहले केंद्र सरकार ने गैर-कानूनी बताया और फिर मार्च 2024 में हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दे दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से भी सरकार को राहत नहीं मिली।
अब जल सेस के खारिज होने के बाद सुक्खू सरकार ने 12 दिसंबर 2025 को नया गजट नोटिफिकेशन जारी कर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर 2 प्रतिशत भूमि मालिया सेस लागू कर दिया है। सरकार का तर्क है कि यह सेस गैर-कृषि भूमि उपयोग के आधार पर लगाया गया है।
इस फैसले से सबसे बड़ा वित्तीय बोझ पंजाब पर पड़ने वाला है। अनुमान है कि सिर्फ पंजाब को ही करीब 200 करोड़ रुपये सालाना अतिरिक्त चुकाने होंगे। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड यानी BBMB ने हिमाचल सरकार के इस फैसले पर औपचारिक आपत्ति दर्ज करवा दी है।
इससे पहले 24 दिसंबर 2025 को पंजाब सरकार भी अपनी लिखित आपत्तियां भेज चुकी है। BBMB का कहना है कि भूमि मालिया सेस परियोजना लागत पर नहीं, बल्कि सिर्फ जमीन के मूल्य पर लगना चाहिए।
हिमाचल सरकार के नोटिफिकेशन के अनुसार BBMB के तीन बड़े प्रोजेक्ट्स पर सालाना 433.13 करोड़ रुपये का सेस तय किया गया है।
इन तीनों परियोजनाओं का बोझ आगे चलकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान सरकारों को उठाना पड़ेगा। इसके अलावा पंजाब पावरकॉम के शानन हाइडल प्रोजेक्ट पर भी करीब 16.32 करोड़ रुपये सालाना अतिरिक्त भार डाला गया है।
3 जनवरी को सीएम सुक्खू ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठक में साफ कह दिया कि भूमि मालिया सेस देना ही होगा। हिमाचल सरकार का कहना है कि राज्य की जमीन पर चल रही परियोजनाओं से होने वाले मुनाफे में राज्य का हिस्सा तय करना उसका अधिकार है।
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BBMB और प्रभावित राज्य अब कानूनी और संवैधानिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा एक बार फिर केंद्र सरकार और अदालत के दरवाजे तक पहुंचेगा। यह विवाद अब सिर्फ टैक्स का नहीं रहा। यह हिमाचल के संसाधनों पर अधिकार, पड़ोसी राज्यों की निर्भरता और संघीय ढांचे की व्याख्या से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है।