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August 31, 2026
हिमाचल में ग्लेशियर झील फटने से मचेगी तबाही- नदियों किनारे बसी 60 हजार आबादी, मंडराया खतरा
एक झटके में 680 से ज्यादा ढांचे हो सकते हैं तबाह
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शिमला। नेपाल में आई जलप्रलय ने हिमालयी राज्यों के लिए एक बार फिर बड़ा खतरा सामने ला दिया है। अगर इसी तरह हिमाचल प्रदेश में किसी संवेदनशील ग्लेशियर झील के टूटने से अचानक बाढ़ आती है, तो इसका असर बेहद व्यापक हो सकता है। प्रदेश की प्रमुख नदियों के किनारे 60 हजार से ज्यादा लोग बसे हुए हैं, ऐसे में अचानक आने वाला सैलाब गांवों, कस्बों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले सकता है।
यह डराने के लिए नहीं, बल्कि खतरे को समय रहते समझने और तैयार रहने की चेतावनी है। सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और यमुना नदी घाटियों में बड़ी आबादी रहती है और कई महत्वपूर्ण शहर व बस्तियां सीधे नदी तंत्र के आसपास बसी हैं।
सबसे बड़ा जोखिम सतलुज नदी घाटी में माना जा रहा है। किन्नौर के नमज्ञा से लेकर शिमला जिले के रामपुर और सुन्नी तक नदी के आसपास करीब 30 हजार लोगों की आबादी रहती है।
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तिब्बत से निकलकर शिपकी ला के रास्ते हिमाचल में प्रवेश करने वाली सतलुज के किनारे पूह, स्पिलो, कनम, मोरांग, रिकांगपिओ के निचले इलाके, कड़छम, वांगतू, भावानगर, नीरथ, झाकड़ी, ज्यूरी और नोगली जैसे क्षेत्र बसे हैं। अगर अचानक नदी का जलस्तर बढ़ता है तो इन इलाकों में बाढ़ के साथ भूस्खलन और भू-कटाव का खतरा भी बढ़ सकता है।
राष्ट्रीय राजमार्ग-5 के कई हिस्से सतलुज के साथ-साथ गुजरते हैं। ऐसे में अचानक बाढ़ या पहाड़ी से मलबा आने पर सड़क संपर्क प्रभावित होने की आशंका रहती है। रामपुर में पहले भी सतलुज के उफान का असर देखने को मिल चुका है। अगस्त 2025 में नदी और इसकी सहायक खड्डों में पानी बढ़ने के बाद बाजार क्षेत्र में खतरे की स्थिति पैदा हुई थी और कुछ घरों व दुकानों को खाली करवाना पड़ा था।
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कुल्लू जिले में करीब 10 हजार लोग ब्यास, तीर्थन, पार्वती और पिन-पार्वती नदी घाटियों के आसपास रहते हैं। मनाली के नेहरूकुंड, बाहंग, क्लाथ, पतलीकूहल, डोभी, रायसन, बबेली, रामशिला, अखाड़ा बाजार, मौहल, शमशी और भुंतर जैसे क्षेत्र ब्यास नदी के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं पार्वती घाटी में मणिकर्ण, कसोल और जिया जैसे इलाके भी संवेदनशील माने जाते हैं। तीर्थन घाटी में बठाहड़, गुशैणी, हामनी और आसपास के क्षेत्र भी अचानक बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।
लाहौल-स्पीति में घेपन झील को संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में शामिल किया जाता है। अगर यहां झील टूटने जैसी स्थिति बनती है तो चंद्रा और भागा नदियों के जरिए चिनाब नदी तंत्र में अचानक पानी बढ़ सकता है। इसका असर सिस्सू, तांदी, केलांग और आसपास के निचले क्षेत्रों तक पहुंचने का खतरा हो सकता है।
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मंडी जिले में करीब 10 हजार की आबादी ब्यास नदी और उसकी सहायक खड्डों के आसपास रहती है। पंडोह से लेकर मंडी शहर तक कई रिहायशी इलाके नदी और खड्डों के नजदीक हैं। ब्यास का जलस्तर बढ़ने पर भ्यूली, बंगाली बस्ती, इंदिरा आवास कॉलोनी, खलियार और पंचवक्त्र मंदिर के आसपास के इलाकों में खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा सुकेती और स्कोढी खड्ड के किनारे भी घनी आबादी है।
आईआईटी रुड़की और आईआईटी रोपड़ के एक अध्ययन में ग्लेशियर झील के टूटने और उसी दौरान अत्यधिक बारिश होने की स्थिति को गंभीर खतरे के तौर पर चिन्हित किया गया है। अध्ययन के मुताबिक ऐसी परिस्थिति में ब्यास और सतलुज में बाढ़ आने पर 680 से ज्यादा ढांचे प्रभावित या ध्वस्त हो सकते हैं।
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2023-24 की आपदा के बाद हिमाचल सरकार ने नदी-नालों के 100 मीटर के दायरे में नए निर्माण पर रोक लगाई है। हालांकि पहले से बसे इलाकों में बड़ी आबादी अब भी नदी और खड्डों के खतरे के बीच रह रही है।
खतरे को कम करने के लिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी की जा रही है। पंडोह बांध से करीब 25 किलोमीटर और भाखड़ा बांध से 100 किलोमीटर पहले नदी के ऊपरी हिस्सों में सेंसर लगाने की योजना है। इसका उद्देश्य झील टूटने जैसी स्थिति में निचले क्षेत्रों तक करीब एक से दो घंटे पहले चेतावनी पहुंचाना है।
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राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन पुष्पेंद्र राणा के अनुसार प्राथमिकता संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों का आकलन और समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करना है।
अचानक बाढ़ का असर केवल आबादी तक सीमित नहीं रहेगा। सतलुज में उफान आने पर किन्नौर की कई जलविद्युत परियोजनाओं और निर्माण स्थलों को नुकसान पहुंच सकता है। इनमें कड़छम, शोंगटोंग, वांगतू, नाथपा-झाकड़ी और रामपुर परियोजनाएं शामिल हैं।
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इसी तरह ब्यास में बाढ़ की स्थिति में पंडोह बांध के बुनियादी ढांचे और उहल-3 हाइड्रो पावर स्टेशन पर असर पड़ सकता है। रावी नदी पर चमेरा-1, चमेरा-2, चमेरा-3 और चांजू हाइड्रो प्रोजेक्ट भी संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में हैं।
कुल्लू के रामशिला और जुआणी रोपा के दुकानदारों और स्थानीय लोगों के लिए ब्यास का बढ़ता जलस्तर हर बरसात चिंता का कारण बनता है। स्थानीय कारोबारी मुनीष भंडारी के मुताबिक 1995, 2023 और 2025 में ब्यास में बाढ़ के कारण दुकानों को खाली करना पड़ा था। उनका कहना है कि नदी के दोनों तरफ सुरक्षा व्यवस्था मजबूत किए जाने की जरूरत है।