#विविध
May 27, 2026
हिमाचल की झील कश्मीर तक मचाएगी तबाही...भारी फ्लड का अलर्ट, खतरे में कई गांव
लगातार पिघल रहे ग्लेशियर, रेड जोन में कई इलाके
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लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में मौजूद खूबसूरत सिस्सू गांव इन दिनों एक गंभीर प्राकृतिक खतरे की वजह से चर्चा में है। पर्यटन के लिए तेजी से पहचान बना चुका यह इलाका अब बढ़ती ‘घेपन झील’ के कारण चिंता के केंद्र में आ गया है।
वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट ने संकेत दिए हैं कि अगर भविष्य में यह झील फटती है, तो घाटी के कई गांवों, सड़कों और पुलों पर भारी तबाही टूट सकती है। यह झील कश्मीर तक तबाही मचा सकती है।
हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और नेशनल रिमोट सेंसिंग केंद्र की संयुक्त स्टडी में सामने आया है कि क्लाइमेट चेंज के कारण क्षेत्र के ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। इसी वजह से घेपांग ग्लेशियर के पास बनी झील का दायरा तेजी से बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1989 में इस झील का क्षेत्रफल करीब 36 हेक्टेयर था, जो 2022 तक बढ़कर 100 हेक्टेयर से ज्यादा हो चुका है। यानी तीन दशक में इसका आकार लगभग तीन गुना तक फैल गया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह झील सामान्य झील नहीं बल्कि “मोरेन डैम्ड ग्लेशियल लेक” है। इसका मतलब यह है कि झील पत्थरों, रेत और मलबे से बने एक प्राकृतिक बांध के पीछे बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बांध बेहद संवेदनशील होते हैं और भारी बारिश, हिमस्खलन, लैंडस्लाइड या ग्लेशियर के टूटे हिस्से के झील में गिरने से कभी भी टूट सकते हैं।
स्टडी रिपोर्ट में सिस्सू को सबसे ज्यादा खतरे वाले रेड जोन में रखा गया है। अनुमान है कि यदि झील फटती है तो मात्र 20 से 21 मिनट के भीतर बाढ़ का पानी गांव तक पहुंच सकता है। पानी की रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा हो सकती है, जबकि कई स्थानों पर इसकी गहराई 20 मीटर तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह सिर्फ पानी की बाढ़ नहीं होगी। इसके साथ भारी मात्रा में मलबा, बड़ी-बड़ी चट्टानें और ग्लेशियर से टूटे विशाल पत्थर भी नीचे आएंगे, जिससे नुकसान कई गुना बढ़ सकता है। घेपन झील और सिस्सू के बीच दूरी लगभग 11 किलोमीटर बताई गई है, इसलिए खतरे की स्थिति में लोगों को संभलने का समय बेहद कम मिलेगा।
स्थानीय लोगों में भी इस खतरे को लेकर डर बढ़ने लगा है। पंचायत से जुड़े लोगों का कहना है कि घेपन क्षेत्र में एक और झील बनने की प्रक्रिया जारी है। उनका मानना है कि अगर किसी कारण से ग्लेशियर के नीचे दबा हिस्सा अचानक टूटता है, तो घाटी में विनाशकारी स्थिति पैदा हो सकती है।
फिलहाल, प्रशासन की ओर से इलाके में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है, लेकिन यह अभी परीक्षण चरण में है। प्रशासन लगातार लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, दूसरी ओर पर्यटन सीजन के दौरान रोजाना हजारों वाहन सिस्सू पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि बढ़ते ट्रैफिक और अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरणीय दबाव और बढ़ रहा है, इसलिए यहां भी वाहनों की संख्या सीमित करने जैसे कदमों पर विचार होना चाहिए।
पूर्व SDMA निदेशक डीसी राणा के अनुसार झील का आकार और गहराई लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर मेल्टिंग की वजह से भविष्य में खतरा और गंभीर हो सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी, समय रहते चेतावनी प्रणाली और मजबूत आपदा प्रबंधन तैयारियां बेहद जरूरी है- ताकि किसी संभावित प्राकृतिक आपदा से जनजीवन को सुरक्षित रखा जा सके।