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March 1, 2026
हिमाचल में गिरा ग्लेशियर : 4 गांव पर मंडराया खतरा, बर्फीला तूफान देख सहमे लोग
बर्फ के महीन कणों का गुबार कुछ समय तक वातावरण में छाया रहा।
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लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों में शनिवार दोपहर एक बड़ा प्राकृतिक घटनाक्रम देखने को मिला। यानदे गंग हिमनद का एक हिस्सा टूटकर हिमस्खलन (एवलांच) के रूप में नीचे आ गिरा।
यह हिमनद गोंदला क्षेत्र के ठीक सामने पीर पंजाल पर्वतमाला की ऊंची चोटी पर स्थित है। ये सैकड़ों वर्षों से लाहौल घाटी के हिमनद का हिस्सा रहा है। करीब ढाई बजे अचानक बर्फ का विशाल हिस्सा दरक कर नीचे लुढ़का और तेज गर्जना के साथ घाटी में गूंज उठी।
स्थानीय लोगों के अनुसार एवलांच का मलबा सीधे चंद्रा नदी तक जा पहुंचा। इस घटना के बाद लोगों में हड़कंप मच गया। हालांकि, राहत की बात यह रही कि घटना में किसी प्रकार की जनहानि या संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ।
हिमस्खलन से उठा बर्फीला तूफान नदी के पार बसे रालिंग, खंगसर, जांगला और मूर्तिचा गांवों तक महसूस किया गया। लोगों ने बताया कि अचानक तेज ठंडी हवा का दबाव और बर्फ के महीन कणों का गुबार कुछ समय तक वातावरण में छाया रहा। हालांकि यह प्रभाव अल्पकालिक था और स्थिति जल्द सामान्य हो गई।
गोंदला पंचायत के प्रधान सूरज ठाकुर ने बताया कि मौसम में बदलाव के दौरान इस तरह की घटनाएं घाटी में सामान्य मानी जाती हैं। हालिया बर्फबारी के बाद तापमान में अचानक बढ़ोतरी से हिमनद का हिस्सा अस्थिर हो गया था, जिसके कारण यह टूटकर नीचे आ गिरा। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि तापमान में उतार-चढ़ाव और बर्फ की परतों के भीतर दबाव बनने से ऐसे एवलांच की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि इस बार कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन लगातार टूटते हिमखंडों ने पर्यावरण को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। स्थानीय जानकारों का कहना है कि बीते वर्षों में घाटी के कई ग्लेशियरों का आकार धीरे-धीरे कम हुआ है। जलवायु परिवर्तन, कम वर्षा और बढ़ते तापमान का प्रभाव अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी स्पष्ट दिखने लगा है।
प्रदेश में इस वर्ष मौसम का मिजाज भी असामान्य रहा है। फरवरी महीने में सामान्य 101.8 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 14.7 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य से 86 प्रतिशत कम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कम वर्षा और बढ़ते तापमान का सीधा असर हिमनदों की स्थिरता पर पड़ता है। लाहौल घाटी में हुई यह ताजा घटना फिलहाल नुकसानरहित रही, लेकिन यह आने वाले समय के लिए एक चेतावनी जरूर है कि पहाड़ों का प्राकृतिक संतुलन बदल रहा है।