#विविध
January 13, 2026
मोदी सरकार ने दिया धोखा! आज CM सुक्खू से मिलेंगे किसान-बागवान, प्रदर्शन की चेतावनी
वादा 100% ड्यूटी का था, घटाकर 25% कर दी
शेयर करें:

शिमला। हिमाचल के पहाड़ों में इस बार चिंता मौसम की नहीं, बाजार की है। सेब के बागानों में मेहनत तो उतनी ही है, लेकिन डर अब आसमान से नहीं, सिस्टम से लगने लगा है। भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ने हिमाचल के सेब बागवानों की नींद उड़ा दी है। न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटने के बाद बागवानों को आशंका है कि सस्ते विदेशी सेब भारतीय मंडियों में भर जाएंगे और हिमाचल का सेब दाम और मांग दोनों खो देगा।
प्रदेश के सेब बागवान आज CM सुखविंदर सिंह सुक्खू से मुलाकात करने जा रहे हैं। इस बैठक में वे न्यूजीलैंड के सेब पर घटाई गई इम्पोर्ट ड्यूटी का कड़ा विरोध दर्ज कराएंगे। बागवान CM से मांग करेंगे कि राज्य सरकार इस मुद्दे को मजबूती से केंद्र सरकार के समक्ष उठाए और सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत किया जाए। बागवानों का कहना है कि यह सिर्फ व्यापार नीति नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का सवाल है।
बागवानों के आक्रोश की एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह चुनावी वादा भी है, जो उन्होंने 2014 में हमीरपुर के सुजानपुर में किया था। तब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 100 प्रतिशत करने का वादा किया था। साथ ही हिमाचली सेब को बढ़ावा देने के लिए कोल्ड ड्रिंक में सेब जूस मिलाने जैसे आश्वासन भी दिए गए थे। बागवानों का आरोप है कि न तो ड्यूटी बढ़ाई गई और अब उल्टा दिसंबर में न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दी गई है।
हिमाचल का सेब उद्योग करीब 5500 करोड़ रुपए का है और इससे तीन लाख से अधिक बागवान परिवारों की रोज़ी-रोटी जुड़ी है। सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष सोहन ठाकुर का कहना है कि देश की एपल इंडस्ट्री को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई जानी चाहिए थी, ताकि भारतीय सेब सस्ते आयातित सेब से प्रतिस्पर्धा कर सके।
उन्होंने चेतावनी दी कि न्यूजीलैंड की आड़ में दूसरे देश भी ड्यूटी घटाने का दबाव बनाएंगे, जिससे हिमाचल के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड का सेब उद्योग भी गहरे संकट में आ जाएगा।
स्टोन फ्रूट एसोसिएशन के अध्यक्ष और सेब बागवान दीपक सिंघा ने कहा कि इस करार के बाद भारत में सेब का आयात बढ़ेगा, जिससे कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने उस तर्क को भी खारिज किया कि अप्रैल से अगस्त के बीच हिमाचल का सेब बाजार में नहीं होता।
उनका कहना है कि हिमाचल का सेब जून में मंडियों में आ जाता है और अगस्त में सीजन पीक पर होता है। ऐसे में सस्ते आयातित सेब सीधे हिमाचली सेब से टकराएंगे और नुकसान सबसे ज्यादा हिमाचल के बागवानों को होगा।
बागवानों के विरोध के पीछे एक तकनीकी और आर्थिक वजह भी है। हिमाचल में अभी प्रति हेक्टेयर 7 से 8 मीट्रिक टन सेब की पैदावार होती है, जबकि न्यूजीलैंड में यही पैदावार 60 से 70 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है। इसकी वजह से हिमाचल में एक किलो सेब तैयार करने की लागत करीब 27 रुपए पड़ती है।
ऐसे में बागवानों को तभी फायदा हो पाता है जब सेब 50 से 60 रुपए किलो बिके। लेकिन अगर ज्यादा पैदावार वाले देशों से सस्ता सेब कम ड्यूटी पर भारत आएगा, तो हिमाचल का सेब बाजार में टिक नहीं पाएगा।