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December 17, 2025

हिमाचल में सेब पर संकट- बर्फबारी नहीं हुई तो चौपट होगा कारोबार,पौधों में लगा रोग- बागवान निराश

बारिश और बर्फबारी न होने से बागबानों की बढ़ी चिंता 

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Snowfall shortage

शिमला। दिसंबर महीने में हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों पर चांदी जम जाती थी। प्रदेश के जिला कुल्लू, शिमला, किन्नौर और लाहौल स्पीति के कई क्षेत्रों में तो 1 से 2 फीट तक की बर्फबारी दर्ज की जाती थी। मगर इस बार पहाड़ सफेद की जगह काले नजर आ रहे हैं और बाकी क्षेत्रों में बर्फ तो छोड़िए, पिछले 3 महीने से पानी की एक बूंद तक नहीं बरसी है। मौसम की इस बेरुखी ने बागवानी पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। पहाड़ी इलाकों में यह समय पौधों की गुड़ाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, लेकिन नमी की कमी के कारण यह कार्य नहीं हो पा रहा है। इसके चलते पौधों में बीमारियां पनपने लगी हैं, जिससे बागबानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।

बारिश और बर्फबारी न होने से बागबानों की बढ़ी चिंता 

बता दें कि नवंबर और दिसंबर का समय नए पौधे लगाने और पुरानों बागीचों की गुड़ाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है लेकिन बारिश न होने से यह काम नहीं हो रहा है। बारिश न होने से बागीचों की मिट्टी से नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है, जिससे पौधों की सेहत पर सिधा असर पड़ रहा है। 

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सेब के पेड़ो को लग रही है कैंकर बीमारी 

सूखे के कारण सेब के पौधों में कैंकर जैसी बीमारियां बढ़ने लगी हैं और कई जगह टहनियां सूख रही हैं। पानी की कमी से बागबान न तो गुड़ाई कर पा रहे हैं और न ही खाद डाल पा रहे हैं, जिससे पुराने फलदार पेड़ों को बचाना मुश्किल हो गया है। बागबानों को चिंता है कि अगर सूखा ज्यादा समय तक रहा तो सेब के पौधों को जरूरी चिलिंग ऑवर्स नहीं मिल पाएंगे।

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दिसंबर का महीना इसके लिए बेहद अहम होता है, लेकिन इस बार न बारिश हुई है और न ही बर्फबारी, जिससे सेब उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई हैसिंचाई पर जोर देने की सलाह दे रहे है। विशेषज्ञ बागबानी विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध है, वहां तुरंत पानी देना शुरू किया जाए। इस समय सेब के पौधों को नमी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। पर्याप्त सिंचाई से पौधों को कुछ हद तक राहत मिल सकती है।

खाद डालना भी हुआ मुश्किल

दिसंबर के महीने में बागीचों में फास्फोरस और पोटाश खाद डालना जरूरी होता है, जिससे पौधों की बीमारी लगने से बचती है। लेकिन जमीन में नमी न होने के कारण खाद डालना भी संभव नहीं हो पा रहा है। यदि समय पर बारिश और बर्फबारी नहीं हुई, तो आने वाले समय में करोड़ों रुपये के सेब कारोबार पर संकट गहराने की आशंका है।

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सेब उत्पादन पर पड़ सकता है गहरा असर

विशेषज्ञ बताते हैं कि सेब के पौधों को सात डिग्री सेल्सियस से कम तापमान में करीब 1000 से 1200 घंटे चिलिंग ऑवर्स की जरूरत होती है। चिलिंग ऑवर्स पूरे न होने पर फ्लावरिंग प्रभावित होती है, फूल एकसमान नहीं आते और कमजोर फूल झड़ जाते हैं। इसका सीधा असर सेब की पैदावार पर पड़ता है। कुल मिलाकर मौसम की बेरुखी ने हिमाचल के सेब बागबानों की चिंता बढ़ा दी है और अब सभी की निगाहें दिसंबर में होने वाली बारिश और बर्फबारी पर टिकी हुई हैं।

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