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February 6, 2026
आर्थिक तंगी के बीच सुक्खू सरकार का अफसरों को तोहफा : इंटरनेट खर्च को लेकर दी बड़ी सहूलियत
सरकारी खजाने से खर्च होगा अफसरों के लिए पैसा
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शिमला। एक ओर जहां हिमाचल प्रदेश सरकार लगातार आर्थिक संकट का हवाला दे रही है। वहीं दूसरी ओर सरकारी अधिकारियों के लिए वित्त विभाग की ओर से राहत भरा फैसला सामने आया है।
राज्य सरकार ने सरकारी अफसरों को बड़ा तोहफा देते हुए इंटरनेट भत्ते को लेकर नई इंस्ट्रक्शन जारी की हैं। जिसके तहत अब सरकारी आवासों में लगे इंटरनेट कनेक्शन (ब्रॉडबैंड) के बिल सरकारी खजाने से समायोजित किए जा सकेंगे।
वित्त विभाग द्वारा जारी यह निर्देश पुराने नियमों में आंशिक संशोधन से जुड़ा है। दरअसल, 25 अगस्त 2010 को वित्त विभाग ने एक्सपेंडिचर मद के तहत एक आदेश जारी किया था- जो मुख्य रूप से सरकारी अधिकारियों के लैंडलाइन टेलीफोन बिल के री-इंबर्समेंट से संबंधित था।
उस समय इंटरनेट का उपयोग सीमित था और नियम केवल लैंडलाइन व मोबाइल फोन भत्ते तक ही सीमित रखे गए थे। अब बदलते समय और डिजिटल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने उसी आदेश में इंटरनेट कनेक्शन को भी शामिल कर लिया है।
नए निर्देशों के अनुसार, जिन हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों के सरकारी आवासों में इंटरनेट से जुड़े उपकरण जैसे ब्रॉडबैंड या अन्य इंटरनेट कनेक्शन लगे हुए हैं, उनके बिल अब निर्धारित सीमा के भीतर सरकारी खजाने से एडजस्ट किए जा सकेंगे।
सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक कामकाज तेजी से डिजिटल हो रहा है और अधिकारियों को अपने सरकारी दायित्वों के निर्वहन के लिए इंटरनेट की निरंतर आवश्यकता रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है, ताकि सरकारी कामकाज में किसी तरह की बाधा न आए।
अगर पुराने आदेशों की बात करें, तो अगस्त 2010 में जारी एक्सपेंडिचर से जुड़े नियमों के तहत अधिकारियों को टेलीफोन और मोबाइल भत्ता दिया जाता था। उस समय सचिव स्तर के अधिकारियों को लैंडलाइन के लिए 2500 रुपये मासिक और मोबाइल के लिए 900 रुपये भत्ता मिलता था।
मंडलायुक्त को क्रमशः 2100 रुपये और 800 रुपये, ADGP और MD स्तर के अधिकारियों को 2000 रुपये और 700 रुपये निर्धारित थे। विशेष सचिव को लैंडलाइन के लिए 1300 रुपये और मोबाइल के लिए 500 रुपये मासिक भत्ता दिया जाता था। वहीं, कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट के लिए यह राशि 1300 रुपये और 600 रुपये तय थी, जबकि अन्य अधिकारियों को 700 रुपये और 400 रुपये द्विमासिक भत्ता मिलता था।
अब वित्त विभाग के नए आदेश में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इन्हीं निर्धारित टेलीफोन भत्तों की सीमा के भीतर इंटरनेट का खर्च भी जोड़ा जा सकेगा। यानी, लैंडलाइन के स्थान पर या उसके साथ-साथ इंटरनेट कनेक्शन का बिल भी एडजस्ट किया जा सकेगा।
इस फैसले के बाद यह माना जा रहा है कि सरकारी अधिकारियों के आवासों में इंटरनेट कनेक्शन अब व्यवहारिक रूप से निशुल्क सुविधा के रूप में उपलब्ध हो जाएगा। हालांकि, इस फैसले को लेकर चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
जहां सरकार इसे डिजिटल प्रशासन और कार्यक्षमता बढ़ाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, वहीं आर्थिक तंगी के दौर में इस तरह की सुविधाओं को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। बावजूद इसके, वित्त विभाग का कहना है कि यह आदेश पुराने नियमों का ही विस्तार है और इसका उद्देश्य सरकारी कामकाज को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप बनाना है।