#हिमाचल
September 30, 2026
मेजर मनकोटिया की सैन्य सम्मान के साथ होगी अंतिम विदाई : बेटा-बेटी विदेश में, हो रहा इंतजार
चार दशक की सियासत का आज होगा अंत
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में करीब चार दशक तक सक्रिय रहे पूर्व मंत्री और शाहपुर से पांच बार विधायक रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया का आज उनके पैतृक गांव तियारा में अंतिम संस्कार किया जाएगा। 87 वर्षीय मनकोटिया का मंगलवार को तियारा में हृदयाघात के बाद निधन हो गया था। उनके निधन की खबर से कांगड़ा समेत पूरे प्रदेश में शोक की लहर है।
मेजर मनकोटिया के बेटे और बेटी विदेश में हैं और दोनों के कुछ देर में कांगड़ा के गगल एयरपोर्ट पहुंचने की जानकारी है। उनके पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। अंतिम संस्कार से पहले पार्थिव देह को लोगों के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, जहां बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी, पूर्व सैनिक और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग श्रद्धांजलि देने पहुंच सकते हैं।
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मेजर मनकोटिया के भाई अभय सिंह मनकोटिया के अनुसार, सुबह करीब 11:30 बजे सेना की टुकड़ी उनके घर पहुंचकर सैन्य सम्मान के साथ श्रद्धांजलि देगी। इसके बाद सेना की मौजूदगी में उनकी अंतिम यात्रा तियारा श्मशानघाट के लिए रवाना होगी।
मनकोटिया के निधन के बाद से ही उनके पैतृक घर पर लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी है। तियारा पंचायत के पूर्व प्रधान संदीप मनकोटिया ने बताया कि अंतिम यात्रा में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से पूर्व सैनिक और कांगड़ा के लोग शामिल होंगे। उनके सम्मान में तियारा बाजार भी बंद रखा जाएगा।
मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने हिमाचल की राजनीति में लंबा सफर तय किया। वर्ष 1982 में उन्होंने शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। इसके बाद 1985 में कांग्रेस, 1990 में जनता दल, 1993 में कांग्रेस और 2003 में फिर शाहपुर से विधानसभा चुनाव जीता।
इस तरह वह कुल पांच बार विधायक रहे। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कांग्रेस, जनता दल और बसपा के अलावा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भी चुनाव लड़ा। वर्ष 1995 और 2003 में उन्हें हिमाचल सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी मिली। पर्यटन, नागरिक उड्डयन और कानून जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी उन्होंने संभाले।
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राजनीति में आने से पहले मेजर मनकोटिया भारतीय सेना में अधिकारी रहे थे। सैन्य सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। सेना की पृष्ठभूमि और बेबाक अंदाज के कारण प्रदेश की राजनीति में उनकी अलग पहचान बनी रही। पूर्व सैनिकों से जुड़े मुद्दों को लेकर भी वह सक्रिय रहे।
हिमाचल की सियासत में उनका नाम पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ राजनीतिक मतभेदों को लेकर भी लंबे समय तक चर्चा में रहा। वहीं शाहपुर में पूर्व मंत्री सरवीण चौधरी के साथ उनका चुनावी मुकाबला भी प्रदेश की राजनीति में चर्चित रहा। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में सरवीण चौधरी ने उन्हें शिकस्त दी थी।
मेजर मनकोटिया के निधन पर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा समेत कांग्रेस और भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने शोक जताया है। उनके निधन को हिमाचल की राजनीति के एक लंबे अध्याय के अंत के तौर पर देखा जा रहा है।
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मेजर विजय सिंह मनकोटिया का पैतृक निवास तियारा गांव में था, जो कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालांकि, उनकी कर्मभूमि हमेशा शाहपुर विधानसभा सीट रही। यानी जब-जब वे चुनाव मैदान में उतरे, वे खुद को वोट नहीं डाल पाए, लेकिन इसके बावजूद शाहपुर की जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया। वे 1982, 1985, 1990 और 1993 में लगातार चार बार शाहपुर से जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1998 में एक झटके के बाद उन्होंने 2003 में फिर जोरदार वापसी की और शाहपुर से रिकॉर्ड 5वीं बार विधायक बनने का गौरव हासिल किया।
मनकोटिया का राजनीतिक सफर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ सियासी प्रतिद्वंद्विता के लिए भी जाना जाता रहा। दोनों नेताओं के बीच कई मौकों पर राजनीतिक खींचतान देखने को मिली, लेकिन हिमाचल की राजनीति की यही दिलचस्पी थी कि जिस नेता से राजनीतिक मुकाबला रहा, उसी के नेतृत्व वाली सरकार में मनकोटिया को मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली।
मनकोटिया दो बार हिमाचल सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। पहली बार वर्ष 1993 में वीरभद्र सिंह सरकार में उन्हें कैबिनेट में जगह मिली। इसके बाद वर्ष 2003 में भी वह मंत्री बनाए गए।
मनकोटिया के राजनीतिक जीवन में एक ऐसा दौर भी आया जब उन्हें मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2003 में केंद्र सरकार द्वारा मंत्रियों की संख्या सीमित करने के लिए संवैधानिक व्यवस्था किए जाने के बाद हिमाचल में मंत्रिमंडल के आकार को लेकर बदलाव हुआ। उस समय कांगड़ा से कई बड़े नेता सरकार में मंत्री थे।

इनमें सत महाजन, जीएस बाली, सुजान सिंह पठानिया, मेजर विजय सिंह मनकोटिया, चंद्रेश कुमारी और बृज बिहारी लाल बुटेल शामिल थे। मंत्रियों की संख्या सीमित किए जाने के बाद मनकोटिया को मंत्री पद छोड़ना पड़ा। राजनीतिक जीवन में यह ऐसा दौर था, जब चुनाव जीतने के बावजूद सत्ता के समीकरणों के कारण उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा।
मेजर विजय सिंह मनकोटिया की पहचान सिर्फ एक पार्टी के नेता के रूप में नहीं रही। उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक प्रयोग किए और हिमाचल की सियासत में नए समीकरण बनाने की कोशिश की। वर्ष 1990 में उन्होंने जनता दल का नेतृत्व किया। उस समय जनता दल और भाजपा के बीच राजनीतिक गठजोड़ था। जनता दल ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 11 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे।
भाजपा ने 51 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसके 46 विधायक विजयी हुए। उस चुनाव में कांग्रेस के खाते में केवल नौ सीटें आईं। इस तरह मनकोटिया के नेतृत्व वाले जनता दल ने सीटों की संख्या के लिहाज से कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया था। यह दौर हिमाचल की राजनीति में मनकोटिया के राजनीतिक प्रभाव और उनके प्रयोगों का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
मनकोटिया के राजनीतिक प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया। सबसे चौंकाने वाला फैसला यह था कि उन्होंने अपनी पारंपरिक शाहपुर सीट छोड़कर धर्मशाला से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उन्होंने शाहपुर से अपने करीबी ओंकार राणा को चुनाव मैदान में उतारा, जबकि कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र से संजय चौधरी को बसपा का टिकट दिलाया। संजय चौधरी चुनाव जीतने में सफल रहे।
मेजर विजय सिंह मनकोटिया के राजनीतिक जीवन का एक और बड़ा अध्याय हिमाचल में बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा रहा। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में संजय चौधरी की जीत के साथ हिमाचल विधानसभा में बसपा का खाता खुला।
इस राजनीतिक घटनाक्रम में मनकोटिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्होंने खुद धर्मशाला से चुनाव लड़ने का फैसला किया और कांगड़ा से संजय चौधरी को मैदान में उतारा। संजय चौधरी की जीत के साथ हिमाचल विधानसभा में बसपा को अपना पहला विधायक मिला।
मनकोटिया के राजनीतिक जीवन का यह पहलू भी खास रहा कि उन्होंने केवल अपनी पारंपरिक सीट पर निर्भर रहने की राजनीति नहीं की। शाहपुर में मजबूत राजनीतिक आधार होने के बावजूद उन्होंने अलग विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का जोखिम उठाया। 2007 में धर्मशाला से चुनाव लड़ना उनके इसी राजनीतिक प्रयोग का उदाहरण था। खुद चुनाव हारने के बावजूद उनके राजनीतिक प्रयोग का एक हिस्सा सफल रहा और संजय चौधरी कांगड़ा से जीतकर विधानसभा पहुंचे।
मेजर विजय सिंह मनकोटिया हिमाचल की राजनीति में अपने बेबाक तेवरों और अलग राजनीतिक अंदाज के लिए भी जाने जाते रहे। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर में सत्ता और विपक्ष दोनों के दौर देखे। पांच बार विधायक, दो बार कैबिनेट मंत्री, जनता दल की राजनीति से लेकर बहुजन समाज पार्टी तक का सफर और कई चुनावी प्रयोग—मनकोटिया के राजनीतिक जीवन में ऐसे कई मोड़ रहे, जिन्होंने उन्हें हिमाचल की सियासत के दूसरे नेताओं से अलग पहचान दी।