#अव्यवस्था
February 17, 2026
विक्रमादित्य के वादे भी निकले झूठे... 3 माह से टैंट में रह रहे 16 परिवार, आ*गजनी ने छीने थे आशियाने
86 लोगों ने टैंटों में गुजार दी सर्द रातें, आधी अधुरी राहत ने बढ़ाई चिंता
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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला एक गांव के 16 परिवारों की जिंदगी जैसे थम सी गई है। तीन माह पहले हुए भीषण अग्निकांड ने 16 घरों को राख में बदल दिया और 86 लोगों की दुनिया उजाड़ दी। सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड में मासूम बच्चों और बुजुर्गों के साथ ये परिवार पिछले तीन माह से टैंटों में रात काटने को मजबूर हैं। बड़ी बात यह है कि घटना के बाद मौके पर पहुंचे सुक्खू सरकार के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने राहत की घोषणा जरूर की, लेकिन यह घोषणा कागजों तक ही सीमित रह गई।
कुल्लू जिला के बंजार उपमंडल की तीर्थन घाटी स्थित नोहंडा पंचायत के झनियार गांव में 10 नवंबर 2025 को भीषण अग्निकांड हुआ था। इस आग में 16 मकान पूरी तरह जलकर खाक हो गए। इन घरों में रहने वाले 86 लोग एक झटके में बेघर हो गए। आज तीन महीने बाद भी हालात जस के तस हैं। प्रभावित परिवार टीन और तिरपाल के अस्थायी टैंटों में जीवन यापन कर रहे हैं। सर्द मौसम में खुले हालातों के बीच बच्चों और बुजुर्गों के लिए हालात और भी कठिन हो गए हैं।
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अग्निकांड के बाद लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह गांव पहुंचे थे। उन्होंने मौके पर राहत सामग्री दी और घर निर्माण के लिए तार स्पेन (रोपवे व्यवस्था) स्थापित करने की घोषणा की थी, ताकि भवन निर्माण सामग्री आसानी से गांव तक पहुंचाई जा सके। ग्रामीणों का आरोप है कि तीन माह बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस काम शुरू नहीं हुआ। हालांकि राशि स्वीकृत होने की बात कही गई, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य अब तक प्रारंभ नहीं हुआ है।
झनियार गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। ग्रामीणों को करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर तीदर गांव पहुंचना पड़ता है, जहां से उन्हें आगे की सड़क सुविधा मिलती है। मौजूदा पैदल रास्ता भी आपदा के बाद काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है। भवन निर्माण सामग्री रेत, बजरी और सीमेंट गांव तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। जो अस्थायी रोपवे दूर स्थापित है, वहां से भी सामान पीठ पर ढोकर लाना पड़ता है। ऐसे में घर दोबारा बनाने की कोशिश कर रहे परिवारों के सामने हर दिन नई मुश्किल खड़ी है।
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प्रभावित परिवारों को प्रारंभिक तौर पर 10-10 हजार रुपये की फौरी राहत दी गई थी। बाद में 1 लाख 35 हजार रुपये की पहली किस्त भी जारी की गई। वन विभाग की ओर से भवन निर्माण के लिए लकड़ी उपलब्ध करवाई गई है। लेकिन सवाल यह है कि जब निर्माण सामग्री गांव तक पहुंच ही नहीं पा रही, तो घर बनेंगे कैसे? ग्रामीणों का कहना है कि राहत के नाम पर उन्हें सिर्फ आश्वासन मिले, असली मदद अब तक अधूरी है।
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गांव में पेयजल संकट भी गहरा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर आग लगने के समय गांव में पर्याप्त पानी होता, तो नुकसान कम हो सकता था। आग के बाद एक बड़ी पानी की टंकी तो पहुंचाई गई, लेकिन उसमें अब तक नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। आधे रास्ते तक पाइप बिछाने के बाद काम रुक गया। ग्रामीणों का कहना है कि भविष्य में ऐसी घटना से बचाव के लिए गांव में स्थायी जल व्यवस्था अत्यंत जरूरी है।
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जिला प्रशासन की ओर से कहा गया है कि जल्द ही तार स्पेन का कार्य शुरू किया जाएगा। लोक निर्माण और जल शक्ति विभाग को भी निर्देश दिए गए हैं कि सड़क और पानी की व्यवस्था पर शीघ्र काम शुरू किया जाए। लेकिन झनियार के ग्रामीणों के लिए अब आश्वासन से ज्यादा जरूरी है जमीनी कार्रवाई। तीन महीने से टैंटों में गुजार रहे 16 परिवारों की पीड़ा यह सवाल उठा रही है कि क्या राहत सिर्फ कागजों तक सीमित है?