#अव्यवस्था
February 27, 2026
हिमाचल में आर्थिक संकट गहराया : सरकारी बॉंड बेचकर 1 हजार करोड़ का लोन लेंगे CM सुक्खू
सुक्खू सरकार ने 20 साल के लिए लिया गया कर्ज
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की आर्थिक सेहत को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आर्थिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहे राज्य में सुक्खू सरकार ने 1,030 करोड़ रुपये का नया ऋण लेने का फैसला लिया है।
वित्त विभाग की ओर से इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिस पर विभाग के प्रधान सचिव देवेश कुमार के हस्ताक्षर हैं। जारी अधिसूचना के अनुसार यह ऋण 20 वर्षों की अवधि के लिए उठाया जा रहा है।
इसकी प्रभावी तिथि 4 मार्च 2026 मानी जाएगी, जबकि परिपक्वता (मॅच्योरिटी) 4 मार्च 2046 को होगी। ब्याज दर नीलामी में तय होने वाली कट-ऑफ यील्ड के आधार पर निर्धारित की जाएगी। सरकार हर वर्ष 4 सितंबर और 4 मार्च को ब्याज का भुगतान करेगी।

अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यह कर्ज राज्य में प्रस्तावित विकास योजनाओं, आधारभूत ढांचे को मजबूत करने और विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के संचालन के लिए लिया जा रहा है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सिंचाई जैसे क्षेत्रों में संसाधनों की कमी को देखते हुए सरकार इसे आवश्यक कदम बता रही है।
राज्य सरकार ने इस ऋण के लिए केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति प्राप्त की है। यह मंजूरी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293(3) के तहत दी गई है, जिसके अनुसार कोई भी राज्य सरकार केंद्र की स्वीकृति के बिना नया कर्ज नहीं ले सकती, यदि उस पर पहले से केंद्र का बकाया हो।

आपको बता दें कि हिमाचल प्रदेश सरकार ये 1030 करोड़ रुपये बका लोन बैंक से सीधे नहीं ले रही है। वो सरकारी बॉन्ड बेच रही है। हिमाचल सरकार खुद नीलामी नहीं कर सकती। इसलिए RBI उसकी तरफ से ये बॉन्ड बेचेगा। 2 मार्च 2026 को मुंबई में नीलामी होगी। जो इस बॉऩ्ड को खरीदेगा- सरकार उसका पैसा 20 साल बाद लौटाएगी और हर साल उस पर ब्याज भी देगी। कुल ₹1030 करोड़ का 10% हिस्सा आम लोगों/संस्थाओं के लिए होगा। यानी एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा 1 प्रतिशत तक ही बोली लगा सकता है।
विदित रहे कि, हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2017 में राज्य पर लगभग 48 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था। इसके बाद पिछली सरकार के कार्यकाल में यह बढ़कर करीब 76 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वर्तमान में राज्य का कुल कर्ज एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुका है।
सुक्खू सरकार अपने अब तक के साढ़े तीन वर्षों के कार्यकाल में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक का ऋण ले चुकी है। विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है कि लगातार बढ़ते कर्ज से आने वाली पीढ़ियों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, जबकि सरकार का तर्क है कि सीमित संसाधनों और घटती केंद्रीय सहायता के बीच विकास कार्यों को जारी रखने के लिए उधारी जरूरी हो गई है।
राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक और दबाव केंद्र सरकार द्वारा रैवेन्यू डेफिसिट ग्रांट बंद किए जाने से पड़ा है। यह अनुदान हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए बड़ी राहत माना जाता था। इसके बंद होने से राज्य के राजस्व और व्यय के बीच का अंतर और बढ़ गया है, जिसे पाटने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज उठाना पड़ रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर उधार लिए गए धन का उपयोग उत्पादक और आय सृजन करने वाली परियोजनाओं में किया जाता है, तो लंबे समय में राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। लेकिन यदि राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय नहीं किए गए, तो कर्ज का दायरा और विस्तृत हो सकता है।