#अव्यवस्था
January 29, 2026
हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल का नतीजा : समय पर नहीं मिला इलाज- कोमा में 6 वर्षीय बच्ची , सड़ गया पैर
रचना ICU में भर्ती है और उसकी हालत नाजुक बनी हुई है
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश में डॉक्टरों और एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल का मानवीय चेहरा एक मासूम बच्ची के दर्द के रूप में सामने आया है। धर्मशाला की रहने वाली महज छह साल की बच्ची रचना समय पर इलाज न मिलने के कारण आज जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है।
मामूली सी चोट से शुरू हुआ दर्द सिस्टम की लापरवाही, हड़ताल और अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया और बच्ची को कोमा तक पहुंचा दिया। बच्ची का पिता कर्ज ले-ले कर बच्ची का इलाज करवा रहा है।
रचना पहली कक्षा की छात्रा है। उसके पिता जादे बेलभरिया माहौत, जो पेशे से प्रवासी मजदूर हैं, बताते हैं कि 26 दिसंबर को रचना स्कूल से घर लौटी तो उसकी टांग में तेज दर्द था। शुरुआत में परिवार को लगा कि शायद खेलते समय हल्की चोट लगी होगी, लेकिन दर्द बढ़ता गया।
वे बिना देरी किए बच्ची को जोनल अस्पताल धर्मशाला लेकर पहुंचे। उस दिन शिमला में डॉक्टर-मरीज मारपीट की घटना के विरोध में डॉक्टर हड़ताल पर थे। इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टर ने एक्स-रे देखने के बाद यह कहकर बच्ची को घर भेज दिया कि कोई फ्रैक्चर नहीं है और पेन किलर दे दी। लेकिन यह ‘रूटीन’ सलाह रचना के लिए भारी साबित हुई।
उस रात बच्ची पूरी तरह दर्द से कराहती रही। अगले दिन परिजन फिर अस्पताल पहुंचे, लेकिन वहां बताया गया कि ऑर्थोपेडिक डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें बच्ची को टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर करने की सलाह दी गई। हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, लेकिन इलाज का कोई पुख्ता इंतजाम नजर नहीं आया।
जब परिवार ने एंबुलेंस की व्यवस्था करनी चाही, तो पता चला कि एंबुलेंस स्टाफ भी हड़ताल पर है। मजबूरी में एक गरीब मजदूर पिता ने टैक्सी किराए पर ली और किसी तरह बच्ची को टांडा मेडिकल कॉलेज पहुंचाया। तब तक काफी कीमती समय हाथ से निकल चुका था।
टांडा पहुंचने पर डॉक्टरों ने बताया कि टांग में जख्म के साथ गंभीर संक्रमण फैल चुका है। तत्काल ऑपरेशन किया गया, लेकिन संक्रमण शरीर में तेजी से फैलता चला गया। इलाज के बावजूद बच्ची की हालत बिगड़ती गई और वह कोमा में चली गई। फिलहाल रचना ICU में भर्ती है और उसकी हालत नाजुक बनी हुई है।
रचना के पिता सात बच्चों के पिता हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। बेटी की जान बचाने के लिए अब तक उन्हें करीब 60 हजार रुपये का कर्ज लेना पड़ा है। यह रकम उनके लिए किसी पहाड़ से कम नहीं है। इलाज का खर्च लगातार बढ़ रहा है, जबकि आमदनी का कोई ठोस जरिया नहीं।
हालांकि इस मुश्किल घड़ी में कुछ संस्थाओं और लोगों ने मदद का हाथ बढ़ाया। रेडक्रास सोसाइटी ने 12 हजार रुपये, इनर व्हील क्लब ने 16 हजार 500 रुपये और स्कूल के एक शिक्षक ने 6 हजार रुपये की सहायता दी। इसके बावजूद आर्थिक संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन भी हरकत में आया। डीसी कांगड़ा हेमराज बैरवा ने टांडा मेडिकल कॉलेज के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को निर्देश दिए हैं कि बच्ची का इलाज पूरी तरह मुफ्त सुनिश्चित किया जाए। यह आदेश परिवार के लिए राहत की किरण जरूर है, लेकिन सवाल यह है कि अगर शुरुआत में ही इलाज मिल जाता, तो शायद यह नौबत ही न आती।
रचना जिस स्कूल में पढ़ती है, वह भी सरकारी सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करता है। हैरानी की बात यह है कि स्कूल धर्मशाला सचिवालय और डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन ऑफिस से महज 100 गज की दूरी पर है, लेकिन बच्चों के आने-जाने के लिए आज तक पक्का रास्ता तक नहीं बन पाया। यही स्कूल रचना और उसकी बहनों रुकसाना व दक्षणा का भविष्य गढ़ने का जिम्मा उठाए हुए है।
लोगों का कहना है कि यह मामला केवल एक बच्ची की बीमारी का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है। हड़ताल का खामियाजा अगर मासूम बच्चों को अपनी जान देकर चुकाना पड़े, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। रचना की हालत ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर आम आदमी और गरीब परिवारों की जान की कीमत सिस्टम में कितनी है।