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March 25, 2026

उड़ता हिमाचल... चिट्टे ने उजाड़े हंसते-खेलते परिवार, 3 साल में 66 लोगों की मौ*त

हजारों केस लंबित-कानून और सिस्टम के सामने बड़ी चुनौती

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शिमला। हिमाचल प्रदेश, जो कभी अपनी शांत वादियों और साफ वातावरण के लिए पहचाना जाता था। आज एक ऐसे संकट से जूझ रहा है जो दिखता नहीं, लेकिन अंदर ही अंदर समाज को खोखला कर रहा है।

पहाडों को निगल रहा नशा

नशे का बढ़ता जाल अब पहाड़ों की शांति को निगलता जा रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस जाल में सबसे ज्यादा युवा फंस रहे हैं और कई मामलों में यह लत जानलेवा साबित हो रही है।

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तीन साल में 66 मौतें

हाल ही में विधानसभा में पेश सरकारी आंकड़ों ने इस कड़वी हकीकत को उजागर कर दिया है। विधायक जीत राम कटवाल और प्रकाश राणा द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि साल 2023 से जनवरी 2026 तक ड्रग्स ओवरडोज के चलते 66 लोगों की मौत हो चुकी है।

हर साल बदलता मौत का ग्राफ

अगर पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद चिंताजनक नजर आती है।

  • साल 2023 में 8 लोगों की जान ओवरडोज से गई
  • 2024 में यह संख्या तेजी से बढ़कर 31 तक पहुंच गई
  • 2025 में थोड़ी कमी जरूर दर्ज की गई, लेकिन फिर भी 27 लोगों की मौत इस वजह से हुई

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अदालतों में अटके हजारों मामले

यह उतार-चढ़ाव भले ही आंकड़ों में दिखता हो, लेकिन असल तस्वीर यही है कि नशे का खतरा लगातार बना हुआ है और समाज के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। कानूनी मोर्चे पर पुलिस ने कार्रवाई तो की है, लेकिन नतीजे उतने प्रभावी नहीं दिख रहे। इस अवधि में ड्रग्स से जुड़े कुल 6,246 मामले दर्ज किए गए- जिनमें से 5,684 मामलों में पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की।

सजा दर बेहद कम

इसके बावजूद सजा की दर बेहद कम है। अब तक केवल 108 मामलों में ही आरोपियों को दोषी ठहराया जा सका है, जबकि 139 आरोपी बरी हो चुके हैं। यह स्थिति बताती है कि जांच, सबूत और न्यायिक प्रक्रिया के बीच कहीं न कहीं कमजोर कड़ी मौजूद है।

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फैसला आना है बाकी

नशे के खिलाफ लड़ाई को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार। वर्तमान में 5,437 मामले अदालतों में लंबित हैं, जहां फैसला आना बाकी है। इसके अलावा 486 मामलों में अभी भी जांच जारी है। कुछ मामलों में पूरे सबूत न मिलने के कारण पुलिस को क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी है- जो इस समस्या की जटिलता को और बढ़ाता है।

चिट्टा बना सबसे बड़ा खतरा

हिमाचल में इन दिनों ‘चिट्टा’ यानी सिंथेटिक ड्रग सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। यह नशा न केवल तेजी से फैल रहा है, बल्कि इसकी गिरफ्त में आने वाले युवा जल्दी इसकी लत के शिकार हो जाते हैं।

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आसानी से मिल जाती है जमानत

सरकार ने माना है कि कानूनी प्रावधानों के कारण कई बार आरोपी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं। मौजूदा नियमों के अनुसार 5 ग्राम से कम मात्रा को ‘छोटी मात्रा’ माना जाता है, जिसमें आरोपी को जमानत मिल जाती है।

नशे के नेटवर्क को तोड़ना मुश्किल

5 से 250 ग्राम तक ‘मध्यम मात्रा’ और 250 ग्राम से अधिक ‘व्यावसायिक मात्रा’ में सख्त प्रावधान लागू होते हैं। यही कारण है कि पिछले तीन वर्षों में करीब 5,298 आरोपी जमानत पाने में सफल रहे हैं, जिससे नशे के नेटवर्क को तोड़ना और मुश्किल हो जाता है।

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सरकार का एक्शन प्लान

  • नशे के खिलाफ सख्ती बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार ने एक रणनीति अपनाने की बात कही है।
  • नशा तस्करों की अवैध संपत्तियों को चिन्हित कर जब्त करने की कार्रवाई तेज की जा रही है।
  • नशामुक्त हिमाचल ऐप पर दे सकते हैं नशा तस्करों की सूचना।
  • हेल्पलाइन नंबर 112 के जरिए आम जनता से भी सहयोग मांगा जा रहा है।
  • केमिस्ट दुकानों पर औचक निरीक्षण और पुलिस थानों में ड्रग पैडलर्स के लिए अलग निगरानी रजिस्टर भी तैयार किए जा रहे हैं।
  • नशे की लत से जूझ रहे लोगों को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए ‘दिशा केंद्र’ और सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों का दायरा बढ़ाया जा रहा है।

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समाज के सामने बड़ी चुनौती

यह पूरा घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब तक परिवार, समाज और प्रशासन मिलकर इस समस्या से नहीं लड़ेंगे, तब तक इस अदृश्य दुश्मन पर काबू पाना मुश्किल रहेगा।

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