#अव्यवस्था
September 21, 2025
हिमाचल: 100 साल पुराने हरे भरे पीपल के पेड़ पर चला दी आरी, SDM को नोटिस - मांगा जवाब
धार्मिक आस्था का प्रतीक होता है पीपल का पेड़
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सोलन। हरियाली के लिए देशभर में मशहूर हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर पेड़ों की अवैध कटाई को लेकर बवाल मच गया है। इस बार मामला परवाणू के सेक्टर.5 का है। हैरानी की बात यह है कि यहां पर स्थित करीब 100 साल पुराने पीपल के पेड़ को काट दिया गया। वह भी बिना किसी की वैधानिक अनुमति के। अब इस मामले में कसौली के उपमंडल अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
यह वही हिमाचल है जो हर साल बरसात के मौसम में भीषण भूस्खलनों का सामना करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन आपदाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण वनों की अंधाधुंध कटाई है। बावजूद इसके प्रदेश में हरे-भरे, जीवंत और धार्मिक महत्त्व वाले वृक्षों को भी नहीं बख्शा जा रहा है।
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जानकारी के अनुसार नगर परिषद परवाणू द्वारा कुछ पेड़ों की कटाई के लिए एक सूची तैयार की गई थी, जिसमें सेक्टर-5 स्थित यह ऐतिहासिक पीपल का पेड़ भी शामिल था। नियमानुसार इस तरह के वृक्षों की कटाई से पहले निरीक्षण कर रिपोर्ट उपायुक्त कार्यालय को भेजनी होती है, और अनुमति मिलने पर ही पेड़ काटा जा सकता है। लेकिन इस मामले में न तो कोई रिपोर्ट भेजी गई और न ही अनुमति ली गई।
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परवाणू विकास मंच के अध्यक्ष एवं समाजसेवी सतीश बेरी ने इस अवैध कटाई की सूचना मिलते ही पूरे मामले की जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त की। उन्होंने दस्तावेजों की जांच कर पाया कि न केवल नियमों की अनदेखी हुई है, बल्कि संबंधित विभागों की मिलीभगत भी इस प्रकरण में सामने आ रही है। इसके बाद उन्होंने उपायुक्त सोलन को शिकायत सौंपी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
शिकायत के आधार पर अतिरिक्त उपायुक्त (ADC) सोलन राहुल जैन ने SDM कसौली को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए दो दिन के भीतर स्पष्ट जवाब मांगा है। बताया जा रहा है कि उपायुक्त कार्यालय ने इस संबंध में कई बार स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, जिसके बाद कार्रवाई की गई है।
पीपल का पेड़ भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखता है। यह न केवल राष्ट्रीय वृक्ष है, बल्कि हिंदू आस्था का भी प्रतीक माना जाता है। समाजसेवी सतीश बेरी का कहना है कि इस पेड़ की कटाई केवल पर्यावरण के साथ खिलवाड़ नहीं है, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाने जैसा है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो वह इस मामले को उच्च न्यायालय तक ले जाएंगे।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश पिछले कुछ वर्षों से भयंकर भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में है। मानसून के दौरान सड़कों का टूटना, घरों का बहना और लोगों का विस्थापन आम हो गया है। पर्यावरण विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से चेतावनी दे चुके हैं कि यह सब अंधाधुंध निर्माण और पेड़ों की कटाई का ही नतीजा है। इसके बावजूद, प्रशासन की लापरवाही और राजनीतिक-प्रशासनिक मिलीभगत से प्रदेश में हरे पेड़ों की हत्या बदस्तूर जारी है। यदि अब भी समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो "देवभूमि" कही जाने वाली यह भूमि आने वाले वर्षों में केवल आपदाओं की भूमि बनकर रह जाएगी।