शिमला। चैत्र नवरात्रि के चार दिन गुजर चुके हैं और इन दिनों देशभर के मंदिरों और माता की चौकियों में जयकारे गूंज रहे हैं। सुबह-शाम भक्तों की भीड़ मंदिरों में नजर आ रही है। आज चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन है और इस दिन मां दुर्गा के पांचवे रूप की पूजा होगी, जिन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। मां दुर्गा के सभी रूपों में स्कंदमाता को सबसे ज्यादा ममता वाली माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से माता की पूजा करते हैं।
माता की पूजा करने से होती है संतान सुख की प्राप्ति
चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन, यानी 23 मार्च 2026, मां स्कंदमाता को समर्पित है। इन्हें भगवान कार्तिकेय (स्कंद कुमार) की माता होने के कारण ही स्कंदमाता कहा जाता है। माता स्कंदमाता की विशेषता यह है कि वे अपने भक्तों पर वैसे ही कृपा करती हैं, जैसे एक मां अपने बच्चों पर करती है। उनकी गोद में बाल रूप में विराजमान स्कंद कुमार उनके प्रेम और संरक्षण का प्रतीक हैं।
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माता को प्रसन्न करने के लिए लगाए यह भोग
कहते हैं कि देवी की पूजा करने से बुद्धि बढ़ती है और ज्ञान मिलता है। और जो भी लोग अपने सच्चे मन से माता की पूजा करते हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। इस दिन माता को केले और खीर का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है।
कैसा है स्कंदमाता का रूप
स्कंदमाता की चार भुजाएं होती हैं। दाहिनी तरफ ऊपर वाली भुजा में कमल का फूल होता है। नीचे वाली दाहिनी भुजा में वसुद्र और ऊपर वाली भुजा में भी कमल का फूल होता है। ये कमल उनके ऊपर बैठा रहता है। इसी वजह से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। और इनका वाहन सिंह है।
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पूजा का शुभ समय
इस दिन पूजा के लिए कई विशेष मुहूर्त और समय बताए गए हैं, जिनमें पूजा करना अधिक फलदायी माना जाता है-
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:06 से 05:53 तक
- प्रातः संध्या: 05:29 से 06:40 तक
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:21 से 01:09 तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:49 से 07:13 तक
- सायं संध्या: 06:50 से 08:01 तक
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जाने माता को प्रसन्न करने के उपाए
- सुबह नहा-धोकर साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल साफ करें।
- मूर्ति या तस्वीर रखें और फूलों से सजाएं।
- दीपक और धूप जलाएं।
- माता को कुमकुम, रोली और अक्षत चढ़ाएं।
- कम से कम 108 बार “ॐ देवी स्कंदमातायै नमः” जाप करें।
- पीली मिठाई, खीर या केला भोग लगाएं।
- आरती करें और प्रसाद बांटें।
भवसागर पार करना आसान
मां स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनके उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाते हैं। अगर मन को एकाग्र व पवित्र रखकर मां की पूजा की जाती है तो भक्तों के भवसागर पार करने में मुश्किल नहीं आती।
