शिमला। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के लोगों की देवी-देवताओं से जुड़ी आस्था उनके सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। हिमाचल के लोग अपने देवी-देवताओं को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और हर खुशी या संकट के समय उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। यहां के हर गांव का अपना इष्ट देवता या देवी होती है।
देवी-देवताओं में गहरी आस्था
देवी-देवताओं के स्वागत के लिए निकाले जाने वाले जुलूस यहां की परंपरा का प्रतीक हैं। हिमाचल के लोगों की यह गहरी धार्मिक आस्था उन्हें न केवल एक-दूसरे से जोड़ती है, बल्कि उनकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोए रखती है। उनके लिए देवी-देवता केवल पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि उनके जीवन की शक्ति और प्रेरणा हैं।
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देवी मां ने धारण किया पहलवान का रूप
आज के अपने इस लेख में हम आपको हिमाचल की एक ऐसी देवी मां के बारे में बताएंगे- जिन्होंने पहलवान रूप धारण कर भक्तों का उद्धार किया था। राक्षसों का संहार करने के लिए देवी मां पत्थर फाड़कर प्रकट हुई थीं। हमारे हिमाचल की ये देवी मां ने इस देवभूमि पर राक्षसों के साथ मल्लयुद्ध किया था और पहलवानों की देवी कहलाई थीं।
पहाड़ियों में विराजती हैं मां
हम बात कर रहे हैं डलहौजी में डैनकुंड की पहाड़ियों पर विराजने वाली देवी मां पोहलानी जी की, जिन्हें काली माता के रूप में राक्षसों और डायनों का संहार करने स्वयं भगवान शंकर ने चंबा भेजा था।
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पहले रहते थे डायन और राक्षस
पोहलानी माता मंदिर के पुजारी बताते हैं कि डैनकुंड की इन पहाड़ियों पर पहले डायन और राक्षस रहते थे। उस समय चंबा के राजा स्थानीय बुजुर्गों को चंबा राजमहल में बुला लिया करते थे। और ड़क की कोई सुविधा नहीं होती थी, इसलिए बुजुर्ग यहां से चंबा का सफर पैदल ही तय करते थे।
बुजुर्गों ने लगाई रक्षा की गुहार
मगर इस सफर के दौरान यहां रहने वाली डायनें इन बुजुर्गों को काफी परेशान करती थीं। ऐसे में बुजुर्गों ने भगवान शिव शंकर से रक्षा की गुहार लगाई और भोले शंकर ने काली माता को इनकी रक्षा करने भेज दिया।
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पत्थर फाड़ कर प्रकट हुई मां
बताते हैं कि, काली मां इसी पहाड़ी पर एक पत्थर को फाड़कर हाथ में त्रिशूल लिए कन्या रूप में प्रकट हुईं और डायनों का वद्ध किया। मगर जब राक्षस भी माता से युद्ध करने आ गए, तो उन्होंने पहलवान रूप लेकर सभी राक्षसों का भी संहार कर दिया।
किसान को सपने में दिखी माता
बाद में होवार के एक किसान को माता ने सपने में आकर, यहां पर मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया और माता के आदेशानुसार ही यहां पर मंदिर की स्थापना की गई।
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मंदिर में नहीं लगी है छत
माता के ही आदेशानुसार आज तक इस मंदिर पर छत नहीं लगी है। वहीं, आज भी हर साल इस देवी स्थान पर माता पोहलानी जी के नाम से छिंज यानी दंगल मेला लगता है- जिसमें कई सारे स्टेट्स के नामी पहलवान अपने दांवपेच अजमाने हिमाचल आते हैं।
