चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की पांगी घाटी अपनी अलग पहचान और अनोखी परंपराओं के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर है। जहां एक तरफ कड़ाके की ठंड और बर्फबारी ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी ठंड के बीच पांगी घाटी में राक्षसों और बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए ऐतिहासिक खौउल उत्सव की शुरुआत हो गई है। इस त्योहार को स्थानीय भाषा में चजगी भी कहा जाता है। खौउल उत्सव के आगाज के साथ ही घाटी में एक बार फिर धार्मिक आस्था, परंपरा और उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है।

बर्फ से ढकी घाटी के बीच त्योहार का माहौल 

बता दें कि बीते रविवार जैसे ही इस त्योहार की शुरुआत हुई, वैसे ही घाटी में रौनक लौट आई। लंबे समय से बर्फ और ठंड के कारण लोग अपने घरों तक ही सीमित थे, लेकिन अब हर घर में चहल-पहल दिखाई देने लगी है। शाम होते ही गांवों में रोशनी, सजावट और लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। बर्फ से ढकी घाटी के बीच त्योहार का माहौल अलग ही खुशी देता है।

 

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बुरी शक्तियों को भगाने की परंपरा

खौउल उत्सव को लेकर पांगी घाटी में एक बहुत पुरानी मान्यता चली आ रही है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि सर्दियों के मौसम में घाटी में बुरी शक्तियों या राक्षसों का असर बढ़ जाता है। इन्हीं बुरी शक्तियों को अपने इलाके से दूर भगाने के लिए यह त्योहार मनाया जाता है। इसी मान्यता के चलते लोग पूरे श्रद्धा भाव से खौउल उत्सव मनाते हैं।

मशालों की रोशनी से गूंजा पांगी

रविवार को घाटी की अलग-अलग पंचायतों में सबसे पहले विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद लोग अपने-अपने घरों से जलती हुई मशालें लेकर बाहर निकले। गांवों की गलियों और ढलानों पर मशालों की रोशनी देखने लायक थी।

 

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लोगों का मानना है कि मशाल की आग और रोशनी से बुरी आत्माएं डरकर भाग जाती हैं और गांव में सुख-शांति बनी रहती है। इस दौरान लोगों ने अपने पूर्वजों को भी याद किया और अपने परिवार व गांव की खुशहाली के लिए प्रार्थना की।

पांगी घाटी में गांव-गांव मनाया गया खौउल उत्सव

पांगी घाटी में खौउल उत्सव एक ही दिन नहीं, बल्कि अलग-अलग गांवों में अलग तारीखों पर मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सबसे पहले जम्मू बॉर्डर से सटे पांगी के आखिरी गांव सुराल से होती है। इसके बाद यह उत्सव धीरे-धीरे पूरी घाटी में फैलता है।

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सुराल, धरवास और लुज गांवों में यह त्योहार पहले ही मनाया जा चुका है। अब मुख्यालय किलाड़, मिंधल, साच, कुमार, परमार, फिंडरू और कुलाल जैसे गांवों में खौउल उत्सव पूरे उत्साह और धूमधाम से मनाया गया।

पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग

इस मौके पर गांव के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर सज-धज जाते हैं। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक कपड़ों में नजर आते हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर त्योहार की खुशियां बांटते हैं। साच पंच नाग देवता के चेला इंद्र सिंह ने बताया कि खौउल उत्सव की शुरुआत के करीब 15 दिन बाद पांगी घाटी का सबसे बड़ा और खास त्योहार जुकारू पर्व शुरू होगा। इस पर्व का हर पांगीवासी साल भर इंतजार करता है।

 

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पर्व पर बनाए जाते हैं  पारंपरिक पकवानों 

फिलहाल खौउल उत्सव के चलते पांगी घाटी में दावतों का दौर भी शुरू हो गया है। हर घर में खास पारंपरिक पकवान बनाए जा रहे हैं। मंडे, हलवा, पूरी, चावल, कढ़ी और दाल जैसी चीजें लगभग हर घर में पक रही हैं। रिश्तेदार और पड़ोसी एक-दूसरे के घर जाकर खाना खाते हैं और त्योहार की बधाई देते हैं।

विधायक ने दी लोगों को उत्सव की बधाई

पांगी-भरमौर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने भी खौउल उत्सव के मौके पर पांगी घाटी के सभी लोगों को बधाई दी है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए लोगों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह त्योहार पांगी की संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने का प्रतीक है।

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