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July 22, 2025

हिमाचल के सात्विक का कमाल: भूरे चावल के दाने पर उगा दी लाखों की औषधीय मशरूम 'कीड़ा जड़ी'

बाजार में 80 हजार रुपए किलो है दाम: कैंसर से भी करता है रोकथाम

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Satvik chauhan shimla

शिमला। हिमाचल प्रदेश के युवा नवाचार की एक नई मिसाल बनकर उभरे हैं। शिमला जिला के कोटखाई के छोटे से गांव भवाणा के युवा छात्र सात्विक चौहान ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जो अब तक सिर्फ वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और ऊंचे हिमालयी जंगलों तक सीमित था। डॉ, वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के छात्र सात्विक चौहान ने एक दुर्लभ और बेहद कीमती औषधीय मशरूम  "कीड़ाजड़ी" को पारंपरिक तरीके से अलग हटकर पहली बार सफलतापूर्वक ब्राउन राइस यानी भूरे चावल के दानों पर उगाने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि हिमाचल के युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए द्वार भी खोल सकती है।

 

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कीड़ा.जड़ी, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Cordyceps militaris कहा जाता है, आयुर्वेद और चीनी चिकित्सा में वर्षों से एक बहुउपयोगी दवा के रूप में प्रसिद्ध है। प्राकृतिक रूप से यह मशरूम हिमालय के ऊपरी इलाकों में पाया जाता है, जहां यह एक विशेष कैटरपिलर की लाश पर उगता है। इसकी दुर्लभता और चमत्कारिक औषधीय गुणों के कारण बाजार में इसका मूल्य 80 हजार रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाता है।

सात्विक चौहान, खेती के लिए नई सोच

सात्विक फिलहाल एक निजी संस्थान से एग्री-बिजनेस मैनेजमेंट में एमबीए कर रहे हैं और इससे पहले उन्होंने डॉ वाईएस परमार विश्वविद्यालय, नौणी से वानिकी में बीएससी किया। पारंपरिक पढ़ाई से इतर उनका रुझान नवाचार की ओर रहा। इसी सोच के तहत उन्होंने कीड़ा.जड़ी पर शोध करना शुरू किया। उन्होंने हिमाचल सरकार की मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना के तहत अपने प्रोजेक्ट को आकार दिया। इस योजना के अंतर्गत उन्हें यूनिवर्सिटी के मशरूम रिसर्च सेंटर में लैब, आवश्यक उपकरण, प्रशिक्षण और 25 हजार प्रति माह की आर्थिक सहायता मिली।

 

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भूरे चावल से उगाई कीड़ा.जड़ी, पूरी तरह शाकाहारी और नैचुरल

प्राकृतिक तौर पर Cordyceps sinensis नामक कीड़ा.जड़ी एक कीड़े की लाश पर उगती है, जिससे शुद्ध शाकाहारी लोग इससे परहेज करते हैं। लेकिन सात्विक ने ब्वतकलबमचे उपसपजंतपे प्रजाति को चुनाए जो इसकी पौधीय विकल्प है और इसे कृत्रिम वातावरण में भी उगाया जा सकता है। उन्होंने ब्राउन राइस को आधार बनाकर एक पोषक माध्यम तैयार किया, जिसमें शुगर, यीस्ट और जरूरी मिनरल्स मिलाकर मशरूम के लिए उपयुक्त माहौल बनाया। परिणामस्वरूप महज 3 महीनों में आधा किलो उच्च गुणवत्ता वाली कीड़ा.जड़ी तैयार हो गई, जिसका बाजार मूल्य करीब 80 हजार रुपए प्रतिकिलो है।

 

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क्या है कीड़ा.जड़ी?

कीड़ा.जड़ी एक प्रकार की फंगी (मशरूम) है, जो अपने असाधारण औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। प्राकृतिक रूप से यह फंगस कैटरपिलर पर विकसित होती है और इसीलिए इसे आधा कीड़ा, आधा पौधा भी कहा जाता है।

कीड़ा-जड़ी के प्रमुख फायदे:

  • कैंसर से रक्षा: रिसर्च बताती है कि कॉर्डीसेपिन कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है।
  • इम्यूनिटी बूस्टर: रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी।
  • ऊर्जा और स्टैमिना: थकावट कम करता है, शरीर की ऊर्जा बढ़ाता है – एथलीट्स के लिए लाभदायक।
  • हृदय स्वास्थ्य: हार्ट बीट रेगुलर करता है, ब्लड सर्कुलेशन में सुधार लाता है।
  • फेफड़े और सांस संबंधी रोग: दमा, ब्रोंकाइटिस और सांस की दिक्कतों में मददगार।
  • किडनी की रक्षा: गुर्दों को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करता है।
  • स्नायु और जोड़ स्वास्थ्य: गठिया और जोड़ों के दर्द में लाभकारी।
  • माइक्रो न्यूट्रिएंट्स: इसमें 17 प्रकार के अमीनो एसिड, कैल्शियम, जिंक, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज मौजूद होते हैं।

भारत में फार्मिंग की नई दिशा

कीड़ा-जड़ी की खेती अभी तक चीन जैसे देशों में व्यावसायिक रूप से होती रही है। लेकिन सात्विक का यह प्रयोग साबित करता है कि भारत, विशेषकर हिमाचल जैसे राज्य, भी अब इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहे हैं।  सात्विक की अगली योजना इसे बड़े पैमाने पर तैयार करना, पैकेजिंग व मार्केटिंग करना और ई-कॉमर्स के जरिए देश-दुनिया तक पहुंचाना है। इसके साथ ही वे दूसरे युवाओं को भी इस नवाचार से जोड़ना चाहते हैं, ताकि यह मॉडल स्वरोजगार और ग्रामीण विकास का नया जरिया बन सके।

 

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