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September 12, 2025

हिमाचल के डॉक्टर भानू को राष्ट्रपति ने किया सम्मानित, माउंट एवेरेस्ट भी कर चुके हैं फतह

विश्व के पहले डॉक्टर जिन्होंने फतह किया माउंट एवरेस्ट

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Doctor Bikeing Bhanu

लाहुल-स्पीति। विश्व में कई डॉक्टरों ने चिकित्सा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति जिला के डॉक्टर बाईकिंग भानू ने जो इतिहास रचा है, वह न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लिए गर्व की बात है। वे दुनिया के पहले ऐसे डॉक्टर हैं जिन्होंने चिकित्सा सेवा के साथ-साथ साहस और संकल्प का ऐसा परिचय दिया कि 18 मई 2004 को माउंट एवरेस्ट की चोटी पर विजय प्राप्त की। चिकित्सा सेवा में उनके अभूतपूर्व योगदान और साहसिक उपलब्धियों के लिए भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में विशेष रूप से सम्मानित किया है।

राष्ट्रपति ने किया सम्मानित

डॉक्टर भानू को यह सम्मान देश के दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने तथा नीति निर्माण में अपने योगदान के लिए दिया गया है। देश भर से ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया था, जिन्होंने जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए उल्लेखनीय कार्य किए हैं, और हिमाचल प्रदेश से डॉक्टर बाईकिंग भानू एकमात्र व्यक्तित्व हैं जिन्हें इस प्रतिष्ठित समारोह में आमंत्रण मिला।

 

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लाहुल की धरती से राष्ट्रपति भवन तक का प्रेरणादायक सफर

डॉ भानू का जन्म 28 अगस्त 1976 को हिमाचल प्रदेश के दुर्गम लाहुल-स्पीति जिले के राशील गांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा राजकीय विद्यालय कुल्लू से प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1994 में इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे भारतीय नौसेना में कमीशन अधिकारी बने और अपनी सेवा के दौरान आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज पुणे से जनरल सर्जरी में एमएस किया। दिसंबर 2011 में उन्होंने डीएनबी (जनरल सर्जरी) की उपाधि भी प्राप्त की।

 

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माउंट एवरेस्ट पर लहराया परचम

18 मई 2004 को जब डॉक्टर भानू ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराया, तब उन्होंने केवल एक पर्वत नहीं जीता, बल्कि यह दिखाया कि एक डॉक्टर भी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से दुनिया की सबसे कठिन चुनौतियों को पार कर सकता है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए उन्हें भारतीय नौसेना द्वारा नौसेना शौर्य पुरस्कार से नवाजा गया।

सेना से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति, फिर मातृभूमि की सेवा का संकल्प

डॉ भानू ने 12 दिसंबर 2015 को सर्जन कमांडर के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जनसेवा के एक नए अध्याय की शुरुआत की। उनका उद्देश्य था कि वे अपने गृह राज्य हिमाचल के ग्रामीण, दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में आधुनिक और सस्ती चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवा सकें। इसी संकल्प को साकार करने के लिए उन्होंने लैप्रोस्कोपी लैंसर्स नामक एक विशेष समूह की स्थापना की, जो दुर्गम क्षेत्रों में कार्य कर रहे सर्जनों को लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण प्रदान करता है। इसके अलावा वे भानू अस्पताल कुल्लू और मंडी के संस्थापक निदेशक हैं और नियमित रूप से जनजातीय क्षेत्रों में मुफ्त चिकित्सा शिविर भी आयोजित करते हैं।

 

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पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रेरणा

डॉ भानू के पिता एसडी भानू भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, जबकि उनकी माता पमोली भानू एक समर्पित गृहिणी हैं। देशसेवा और अनुशासन की यह भावना उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली, जिसे उन्होंने चिकित्सा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में पूर्ण रूप से आत्मसात किया।

राष्ट्रपति द्वारा किया गया सम्मान 

डॉ बाईकिंग भानू को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने न केवल जनजातीय क्षेत्रों में सेवाओं के लिए सम्मानित किया, बल्कि उन्हें इन क्षेत्रों की नीतियों के निर्धारण और क्रियान्वयन के लिए सलाहकार के रूप में भी आमंत्रित किया है। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, परिश्रम और सामाजिक दायित्व की भावना किसी भी व्यक्ति को किस ऊंचाई तक ले जा सकती है।

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