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August 1, 2025
सुक्खू सरकार को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: 'अब भी सजग नहीं हुए तो नक्शे से गायब हो जाएगा हिमाचल
हिमाचल में प्राकृतिक आपदा से हुई तबाही पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी
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नई दिल्ली/शिमला। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में बढ़ते पर्यावरणीय संकट पर गंभीर चिंता जताई है और राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह पहाड़ी राज्य भविष्य में नक्शे से गायब हो सकता है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि हिमाचल का अस्तित्व अब सीधे तौर पर खतरे में है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने हिमाचल पर्यावरण संकट पर सख्त टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि अगर हालात नहीं सुधरे तो आने वाले समय में हिमाचल नक्शे से गायब हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दिन.ब.दिन भयावह होता जा रहा है। बेतरतीब विकास, अवैज्ञानिक निर्माण कार्य, अनियंत्रित पर्यटन, और जंगलों की कटाई ने राज्य के पारिस्थितिक तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।
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कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकार का एकमात्र उद्देश्य राजस्व अर्जन नहीं हो सकता। विकास जरूरी है, लेकिन यह पर्यावरण की कीमत पर नहीं हो सकता, कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा। चार लेन की सड़कों, सुरंगों और जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण से क्षेत्र में भूस्खलन, मकानों के धंसने और सड़क हादसों में तेजी से वृद्धि हुई है।
सुनवाई के दौरान एक निजी होटल कंपनी द्वारा श्री तारा माता हिल को हरित क्षेत्र घोषित किए जाने को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को सही ठहराया और पर्यावरण संरक्षण के कदमों को जरूरी बताया। साथ ही, अधिसूचना में देरी पर राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया।
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शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि हिमालयी क्षेत्र के अन्य राज्यों – जैसे उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल आदि – को मिलकर एक साझा रणनीति बनानी चाहिए। संसाधनों और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान कर ही इस विकराल संकट का दीर्घकालिक समाधान निकाला जा सकता है।
कोर्ट ने दो टूक कहा कि राज्य में हाल की बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का परिणाम हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, निर्माण गतिविधियों में नियमों की अनदेखी और पारिस्थितिकीय नाजुकता की उपेक्षा – ये सभी कारक राज्य को तबाही की ओर ले जा रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया और उसे हिमाचल के पर्यावरणीय संकट को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया। अदालत ने केंद्र और राज्य दोनों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि अब तक पर्यावरण संतुलन के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य की क्या योजनाएं हैं। यह मामला अब आगामी 25 अगस्त को दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
कोर्ट ने अंत में कहा कि चाहे अब तक कितना भी नुकसान हो चुका हो, फिर भी अगर तुरंत ठोस और वैज्ञानिक ढंग से कार्यवाही की जाए तो हिमाचल को बचाया जा सकता है। न्यायालय ने राज्य सरकार से कहा कि वह पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में सभी निर्माण कार्यों की समीक्षा करे और जहां आवश्यक हो वहां तत्काल रोक लगाए।