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July 28, 2025
सावन का चौथा सोमवार: हिमाचल के इस मंदिर में वैद्यनाथ रूप में विराजित हैं शिवजी, रावण से जुड़ा है कनेक्शन
बीमारियों को दूर करते हैं शिव
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिव वैद्यनाथ के रूप में विराजमान हैं। पालमपुर से 16 किलोमीटर की दूरी पर बैजनाथ नाम की जगह है जहां ये प्राचीन शिव मंदिर स्थित है। पहले इस जगह को कीरग्राम कहा जाता था जो बाद में मंदिर की वजह से बैजनाथ हो गया। सावन के चौथे सोमवार पर आइए जानते हैं भगवान शिव के इस मंदिर के बारे में जहां रावण भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भगवान शिव बैजनाथ में वैद्यनाथ के रूप में विराजमान हैं। यहां उन्हें वैद्यनाथ या चिकित्सकों के भगवान के रूप में पूजा जाता है। यहां स्थापित शिवलिंग को कामना लिंग भी कहते हैं और मान्यता है कि ये भक्तों के सब दुख और पीडाएं दूर करते हैं।
त्रेता युग में रावण ने कैलाश पर्वत पर शिव भगवान की घोर तपस्या की थी। जब इस तपस्या से शिव भगवान प्रसन्न नहीं हुए तो रावण ने अपने एक-एक सिर को काटकर हवन कुंड में आहुति देना शुरू किया। जब दसवें सिर की बारी आई को भगवान शिव प्रकट हो गए और रावण को वरदान दिया।
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रावण ने शिवजी से उनके आत्मलिंग को लंका ले जाने का वरदान मांगा ताकि वो उसे लंका में स्थापित कर सके। भगवान शिव ने इस दौरान रावण को एक शर्त दी कि उसे शिवलिंग को लंका पहुंचने से पहले कहीं भी धरती पर नहीं रखना है।
रावण जब लंका के लिए निकला तो रास्ते में लघुशंका के लिए रूका और शिवलिंग को एक चरवाहे को पकड़ा दिया। चरवाहा ज्यादा देर वजन नहीं उठा सका और शिवलिंग को धरती पर रख दिया। यही शिविलिंग फिर बैजनाथ में स्थापित हो गया।
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विशेष बात ये है कि इसी कथा के चलते बैजनाथ में दशहरा नहीं मनाया जाता यानी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। ऐसा रावण की भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति के सम्मान में किया जाता है।
आपको बैजनाथ बाजार में कोई सुनार की दुकान भी नहीं मिलेगी। इसकी पीछे एक वजह है। कहते हैं कि जब रावण विश्वकर्मा की पूजा कर रहा था, तब एक सुनार ने विश्वकर्मा का रूप लेकर अपना हिस्सा ले लिया था। इसी के चलते ये स्थान शापित हो गया था।
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मंदिर के शिलालेखों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 1204 ईस्वी में अहुका और मन्युक नाम के दो स्थानीय व्यापारियों ने करवाया था। ये मंदिर शिखर शैली में निर्मित है और अपनी शानदार मूर्तिकला और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।