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February 20, 2026

हिमाचल का चमत्कारी शिव धाम: 122 फीट ऊंचाई और पत्थरों से निकलती है डमरू की आवाज

पत्थरों को हल्के से थपथपाने पर आती है डमरू की आवाज 

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Solan Himachal Pradesh

सोलन। भारत के प्राचीन और चमत्कारी मंदिरों की जब भी चर्चा होती है, तो देवभूमि हिमाचल प्रदेश का नाम सबसे पहले लिया जाता है। पहाड़ों की शांत वादियों, ठंडी हवाओं और आध्यात्मिक वातावरण के बीच सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिर अपनी भव्यता, ऊंचाई और रहस्यमय मान्यताओं के कारण विशेष पहचान रखता है।

पत्थरों को हल्के से थपथपाने पर आती है डमरू की आवाज 

सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिर आस्था, वास्तुकला और रहस्य का अद्भुत संगम माना जाता है। पहाड़ों की शांत वादियों में बसा यह मंदिर अपनी भव्य संरचना और अनोखी मान्यता के कारण विशेष पहचान रखता है। कहा जाता है कि यहां के पत्थरों को हल्के से थपथपाने पर डमरू जैसी ध्वनि सुनाई देती है। श्रद्धालु इसे भगवान शिव की कृपा और दिव्य उपस्थिति का संकेत मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे पत्थरों की संरचना और ध्वनि तरंगों का प्रभाव बताते हैं।

 

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वास्तुकला और रहस्य का अद्भुत संगम

प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह मंदिर सोलन शहर से कुछ दूरी पर ऊंचाई पर स्थित है। चारों ओर हरियाली और पहाड़ी हवा यहां आने वाले लोगों को मानसिक शांति का अनुभव कराती है। मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है और ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों के बीच खड़ा हो। इसी कारण यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है।

एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर?

जटोली शिव मंदिर को एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 111 से 122 फीट के बीच बताई जाती है। मंदिर की स्थापत्य शैली में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय कला का सुंदर मेल देखने को मिलता है। पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और ऊंचा शिखर इसकी भव्यता को और बढ़ा देते हैं।

 

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मंदिर की खास विशेषताएं

  • लगभग 122 फीट ऊंची संरचना
  • दक्षिण-द्रविड़ और उत्तर भारतीय शैली का मिश्रित स्थापत्य
  • पत्थरों पर की गई अद्भुत नक्काशी
  • शिखर पर लगभग 11 फुट ऊंचा स्वर्ण कलश
  • बादलों के बीच खड़ा प्रतीत होने वाला दृश्य

मंदिर निर्माण की कहानी

1950 के दशक में स्वामी कृष्णानंद परमहंस इस स्थान पर आए थे। उन्होंने यहां भगवान शिव की आराधना की और मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। वर्ष 1974 में उन्होंने मंदिर की नींव रखी। हालांकि 1983 में उन्होंने समाधि ले ली, लेकिन मंदिर का निर्माण कार्य नहीं रुका। मंदिर प्रबंधन समिति और श्रद्धालुओं के सहयोग से यह कार्य लगातार चलता रहा।

 

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देश-विदेश द्वारा दान किए करोड़ों रुपये 

करीब 39 वर्षों की लंबी अवधि में यह मंदिर पूरी तरह तैयार हुआ। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण देश-विदेश के भक्तों द्वारा दिए गए दान से किया गया। करोड़ों रुपये की लागत से बना यह मंदिर श्रद्धा और समर्पण की मिसाल है।

आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र

स्थानीय मान्यता के अनुसार, पौराणिक काल में भगवान शिव यहां कुछ समय के लिए तपस्या करने आए थे। इसी कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। आज भी यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं और विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर भक्ति और श्रद्धा से गूंज उठता है।

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