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March 21, 2026
हिमाचल: आज नवरात्र के चौथे दिन होगी मां कूष्मांडा की विशेष पूजा- माता रानी को ऐसे करें प्रसन्न
मां की दिव्य मुस्कान से हुई पूरे ब्रह्मांड की रचना
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शिमला। आज चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन मां कूष्मांडा को समर्पित है। मान्यता है कि आज के दिन माता रानी की पूजा करने से जीवन के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं और वह अपने भक्तों के जीवन से अंधकार मिटाकर सुख-समृद्धि का उजाला भर देती हैं।
मान्यता है कि मां कूष्मांडा ही वह देवी हैं, जिन्होंने अपनी दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की जननी और आदिशक्ति का रूप भी कहा जाता है। उनका स्वरूप ऊर्जा, प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है, जो अपने भक्तों के जीवन से अंधकार को दूर कर देती हैं।
मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं होती हैं, जिनमें वे विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और कमल आदि धारण करती हैं। उनका यह रूप शक्ति का संकेत देता है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन और श्रद्धा से मां की पूजा करता है, उसके जीवन की सभी परेशानियां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग खुलता है।
नवरात्रि के चौथे दिन मां की पूजा के दौरान विशेष मंत्रों का जाप करना बेहद फलदायी माना गया है। “ऊं कुष्माण्डायै नम:” और “ऐं ह्री देव्यै नम:” जैसे बीज मंत्रों का जाप करने से मां की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। इससे मन को शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इसके अलावा मां कूष्मांडा की स्तुति और ध्यान मंत्र का पाठ करने से मानसिक तनाव कम होता है और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है। कहा जाता है कि मां अपने भक्तों को यश, बल और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। उनकी कृपा से रोग, कष्ट और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में बार-बार आ रही बाधाओं से परेशान है या मानसिक और शारीरिक समस्याओं से जूझ रहा है, तो उसे इस दिन मां कूष्मांडा की विशेष पूजा जरूर करनी चाहिए। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया जाप और पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।मां कुष्मांडा का स्तुति मंत्र या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु।