#धर्म
November 19, 2025
51 शक्तिपीठों में से एक है हिमाचल का ये मंदिर, जहां गिरा था देवी सती का बायां कान
विशेष मौके पर ही खुलता हैं मंदिर का मुख्य दरवाजा
शेयर करें:

शिमला। देवभूमि कहे जाने वाला हिमाचल प्रदेश यूं तो कई मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इन्हीं पवित्र स्थानों में से एक है, शिमला जिले का भीमाकाली मंदिर। इस मंदिर में भक्तों का दिन-रात तांता लगा रहता है। कहते हैं कि इस स्थान पर कदम रखते ही मन अपने आप शांत होने लगता है।
आज हम आपको जिला के रामपुर उपमंडल के सराहन में स्थित मां भीमाकाली के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में बताएंगे। शिमला से लगभग 180 किलोमीटर और रामपुर से 47 किलोमीटर की दूरी पर बसे सुंदर पहाड़ों के बीच यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के कारण दूर से ही ध्यान खींच लेता है।
लकड़ी और पत्थर से बनी पहाड़ी शैली में निर्मित यह स्थल देखने वालों को ऐसा अनुभव देता है जैसे समय ठहर गया हो। यह एक मंदिर नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी आस्था, परंपरा और इतिहास का जीवंत रुप है।
मान्यता है कि जब भगवान शिव, सती के शरीर को लेकर आकाश में घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनके दु:ख को शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र चलाया था। उसी दौरान देवी सती का बायाँ कान सराहन में आ गिरा। इस कारण यह स्थान 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है और इसे अत्यंत पवित्र स्थल का दर्जा प्राप्त है।
पुराणों में इस क्षेत्र का नाम शौणितपुर या शायनत नगरी बताया गया है। यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव ने ध्यान और साधना की थी। इतना ही नहीं, दानव राजा बाणासुर भी इसी क्षेत्र के शासक रहे थे, जो भक्त प्रह्लाद के वंशज थे।
भीमाकाली मंदिर की सबसे खास बात इसकी संरचना है। यहाँ पुराना मंदिर केवल आरती और विशेष मौकों पर ही खोला जाता है। नया मंदिर वर्ष 1943 में बनवाया गया, जिसमें भक्त पूरे समय दर्शन कर सकते हैं। परिसर में भैरव और नरसिंह जी के भी मंदिर है।
भीमाकाली न्यास के पुजारी पूर्ण शर्मा बताते हैं कि नवरात्र के समय सराहन में देश–विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। प्रशासन मंदिर परिसर में सफाई, सुरक्षा, पेयजल, और लाइन व्यवस्था का पूरा ध्यान रखता है। गर्भगृह में श्रद्धालुओं को एक–एक समूह में भेजा जाता है ताकि भीड़ नियंत्रित रहे और सभी भक्त शांतिपूर्वक माता का दर्शन कर सकें।