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October 25, 2026

हिमाचल के यह देवता साहिब नहीं लांघते मुख्य द्वार, 365 साल बाद कुल्लू दशहरा उत्सव में हुए शामिल

राजा के बुलाने पर भी महल में नहीं गए देवता

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Kullu Dussehra  Kui Kanda Nag Devta

कुल्लू। देवभूमि कही जाने वाले हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के ढालपुर मैदान में इन दिनों अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव की धूम है। देश-विदेश से लोग यहां पहुंच रहे हैं। कुल्लू की अलग-अलग घाटियों से सैकड़ों देवी-देवता भी दशहरा उत्सव में शामिल होने पहुंचे हैं। लोग दिनभर देवताओं के दर्शन कर उनकी प्राचीन मान्यताओं के बारे में जानकारी ले रहे हैं। इन्हीं में आनी क्षेत्र के कुई कंडा नाग देवता भी शामिल हैं, जिनकी एक खास परंपरा है। ये देवता आज भी किसी के घर के मुख्य दरवाजे से अंदर नहीं जाते।

राजा के बुलाने पर भी महल में नहीं गए देवता

बताया जाता है कि दशहरा उत्सव की शुरुआत के समय राजा ने कुई कंडा नाग देवता को उत्सव में आने का न्योता दिया था। देवता ने राजमहल के अंदर जाने से मना कर दिया। इसके बावजूद जब देवता को जबरदस्ती महल के मुख्य द्वार के अंदर ले जाने की कोशिश की गई तो देवता नाराज हो गए।

 

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इस घटना के बाद देवता ने दशहरा उत्सव में आना ही बंद कर दिया था। हालांकि, श्रद्धालुओं के आग्रह पर पिछले साल 365 साल बाद देवता दोबारा कुल्लू दशहरा में शामिल हुए। इस बार भी कुई कंडा नाग देवता ढालपुर मैदान में विराजमान हैं।

1660 के बाद 2025 में फिर पहुंचे कुल्लू

देवता के गुर विनोद ठाकुर ने बताया कि कुई कंडा नाग देवता किसी भी छत, प्रवेश द्वार या टनल के अंदर से होकर नहीं गुजरते। देवता के साथ करीब 180 किलोमीटर पैदल चलकर कुल्लू पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि साल 1660 में देवता आखिरी बार कुल्लू आए थे। एक घटना के बाद उन्होंने दशहरा उत्सव में आना बंद कर दिया था। श्रद्धालुओं के आग्रह पर पिछले साल से देवता फिर दशहरा उत्सव में शामिल हो रहे हैं। रोजाना हजारों लोग उनके दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

 

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भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र हैं देवता

श्रद्धालु शिव कुमार ठाकुर ने बताया कि वह भी देवता के साथ ढालपुर मैदान पहुंचे हैं। दशहरा उत्सव में आए दूसरे देवी-देवताओं के साथ कुई कंडा नाग देवता का मिलन हो रहा है। उन्होंने बताया कि पूरे क्षेत्र में देवता की काफी मान्यता है। लोगों का विश्वास है कि देवता प्राकृतिक आपदा और महामारी जैसी मुश्किलों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

बूढ़ी नागिन माता के सबसे बड़े बेटे माने जाते हैं

गुर विनोद ठाकुर के अनुसार, तांदी के कुई कंडा नाग देवता को बूढ़ी नागिन माता का सबसे बड़ा पुत्र माना जाता है। इन्हें नौ नाग यानी नसेसर के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि बूढ़ी नागिन माता की सरयोलसर झील में दूसरे देवता झील की सीधी परिक्रमा करते हैं, जबकि कुई कंडा नाग देवता उल्टी परिक्रमा करते हैं। देवता को खास तौर पर सूखे और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए भी माना जाता है।

 

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कई गांवों में हैं देवता के मंदिर

कुई कंडा नाग देवता के तांदी, शेउगी, लटाडागई, घोरला, रूवा, ग्वाल और लुहरी में मंदिर हैं। देवता के साथ छियारा, पांचवीर, जल देवता, मशान देवता, बंशीरा, न्या देवता, जाछनी देवता और काली भगवती भी विराजमान हैं। इसके अलावा देवता के रथ में माता भुवनेश्वरी और माता जलेश्वरी भी विराजमान रहती हैं।

दशहरा में हो रहा देव मिलन और देव गायन

देवता के पुजारी धर्मपाल शर्मा ने बताया कि दशहरा उत्सव के दौरान कुई कंडा नाग देवता दूसरे देवी-देवताओं से मिलन कर रहे हैं। इस दौरान देव गायन भी किया जा रहा है। देव नृत्य के समय पुराने पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। ये गीत खास तौर पर देवता के सम्मान में और विशेष मौकों पर ही गाए जाते हैं। देव मिलन की इस परंपरा को देखने के लिए रोजाना हजारों श्रद्धालु ढालपुर मैदान पहुंच रहे हैं।

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