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February 17, 2026
हिमाचल के इस मंदिर में नहीं जाती महिलाएं- बालक रूप में विराजित हैं पौनाहारी, जानें मान्यता
12 साल तक की थी कठोर तपस्या
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हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश को देवभूमि भी कहा जाता है। इसका बड़ा कारण यहां स्थित सैकड़ों प्राचीन मंदिर, रहस्यमयी आस्थाएं और पीढ़ियों से चला आ रहा लोगों का अटूट विश्वास है। यहां की हर घाटी, हर पहाड़ी और हर गांव में किसी न किसी देवता की गाथा गूंजती है। इन्हीं आस्थाओं के बीच हमीरपुर जिला में स्थित एक ऐसा अनोखा मंदिर भी है, जहां सदियों पुरानी परंपरा के चलते महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है। इस मंदिर की मान्यता, इतिहास और इससे जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों में गहरी श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों पैदा करती हैं।
प्रदेश के जिला हमीरपुर में विराजमान बाबा बालक नाथ मंदिर में मान्यता है कि बाबा बालक नाथ बाल ब्रह्मचारी थे और दियोटसिद्ध की पवित्र गुफा में करीब 12 वर्षों तक घोर तपस्या की थी। इसी गुफा के दर्शन मात्र के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।
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श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से बाबा से कुछ मांगता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। हालांकि सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इस पवित्र गुफा में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी रही है। महिलाएं मंदिर परिसर में बने चबूतरे से ही बाबा के दर्शन करती हैं और आज भी इस परंपरा को कायम रखा गया है।
जानकारी के मुताबिक युवक मंडल चकमोह के सदस्यों ने दियोटसिद्ध पहुंचकर मंदिर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन में पवित्र गुफा में महिलाओं के प्रवेश पर पूर्व की भांति प्रतिबंध जारी रखने की मांग की गई थी। उनका कहना था कि जब से मंदिर अस्तित्व में आया है।
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तब से महिलाएं गुफा में नहीं जातीं और परंपरा का पालन करती आ रही हैं। मंदिर अधिकारी ईश्वर दास ने बताया कि चकमोह युवक मंडल की ओर से ज्ञापन सौंपा गया है, जिसमें सदियों पुरानी प्रथा का हवाला देते हुए महिला श्रद्धालुओं को पवित्र गुफा तक जाने से रोकने की मांग की गई है।
वहीं मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन एवं DSP बड़सर अक्षय सूद ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला श्रद्धालु गुफा तक जाना चाहे तो उसे रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि जब महिलाओं के लिए मंदिर में अलग से चबूतरा बना हुआ है तो गुफा तक महिलाओं का जाना तर्कसंगत नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उच्चतम न्यायालय ने हिंदू मंदिरों में महिलाओं को पुरुषों की भांति पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी है।
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मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि गुरु दत्तात्रेय और बाबा बालक नाथ के बीच गुरु-शिष्य का पवित्र संबंध था। किंवदंतियों के अनुसार जब बाबा बालक नाथ शाहतलाई से धौलागिरी पर्वत की ओर मोर पर सवार होकर गए तो क्षेत्र में उनके चमत्कारों की चर्चा फैल गई।
बताया जाता है कि जब बाबा गोरखनाथ को उनके चमत्कारों की जानकारी मिली तो वे उनकी परीक्षा लेने दियोटसिद्ध पहुंचे। कथा के अनुसार बाबा गोरखनाथ ने अपने चेलों को बाबा बालक नाथ के कान छेदकर मुद्राएं पहनाने का आदेश दिया, लेकिन जब ऐसा करने का प्रयास किया गया तो उनके कानों से रक्त के स्थान पर दूध की धारा प्रवाहित हुई। इसी कारण बाबा बालक नाथ को ‘दूधाधारी’ के नाम से भी जाना जाता है।