#धर्म
February 25, 2026
हिमाचल का मृकुला देवी मंदिर : जहां रखा है महिषासुर का रक्त, देखने पर हो जाते हैं अंधे
इस मंदिर में ‘चलो’ बोलना है मना
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लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश में ऐसे तो कई मंदिर है लेकिन लाहौल में एक ऐसा मंदिर स्थित है जहां एक छोटी सी गलती किसी की आंखों की रोशनी छीन सकती है। दरअसल यहां महिषासुर वध के बाद मां काली ने रक्त से भरा खप्पर रखा था जिसे देखने की सख्त मनाही है। कहा जाता है कि इसे देखने वाला अंधा हो सकता है—यही विश्वास इस मंदिर को और भी खास बनाता है।
लाहौल घाटी के उदयपुर में स्थित मृकुला देवी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और अद्भुत कारीगरी का अनोखा संगम है। समुद्र तल से करीब 2623 मीटर की ऊंचाई पर बना यह मंदिर आज भी लोगों के लिए रहस्य और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब पांडव वनवास में थे, तब वे इस क्षेत्र में भी आए थे। मान्यता है कि महाबली भीम एक विशालकाय पेड़ यहां लाए और भगवान विश्वकर्मा से मंदिर बनाने का आग्रह किया। लोककथाओं के मुताबिक विश्वकर्मा ने एक ही दिन में इस भव्य मंदिर का निर्माण कर दिया। मंदिर कश्मीरी-कन्नौज शैली में बना है और इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी है, जो आज भी लोगों को हैरान कर देती है।
मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो रामायण और महाभारत जीवंत हो उठी हों। लकड़ी की दीवारों और स्तंभों पर कई पौराणिक दृश्य उकेरे गए हैं-
इन नक्काशियों की बारीकी देखकर आज भी लोग दंग रह जाते हैं। पहाड़ी शैली में बनी लकड़ी की दीवारें इस मंदिर को और भी खास बनाती हैं।
यहां मां काली को महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि महिषासुर का वध करने के बाद मां काली ने खून से भरा खप्पर यहीं रखा था। वह खप्पर आज भी मुख्य मूर्ति के पीछे रखा हुआ है, लेकिन उसे देखने की सख्त मनाही है।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि अगर कोई उस खप्पर को देख ले, तो उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। बुजुर्ग बताते हैं कि 1905-06 में चार लोगों ने उसे देखने की कोशिश की थी और उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी।
मंदिर के कपाट पर दो द्वारपाल—बजरंग बली और भैरव खड़े हैं। यहां एक अनोखी परंपरा आज भी निभाई जाती है। श्रद्धालुओं को पहले ही बता दिया जाता है कि दर्शन करने के बाद “चलो यहां से चलते हैं” नहीं बोलना है। मान्यता है कि ऐसा कहने से विपत्ति आ सकती है और द्वारपाल भी साथ चल पड़ते हैं। इसलिए आज भी लोग दर्शन के बाद चुपचाप वापस लौट आते हैं।
घाटी में साल में एक बार फागली उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस उत्सव की पूर्व संध्या पर मंदिर के पुजारी अकेले खप्पर की पूजा करते हैं। उस समय खप्पर बाहर निकाला जाता है, लेकिन उसे कोई भी श्रद्धालु नहीं देखता। यह रस्म पूरी तरह गोपनीय तरीके से निभाई जाती है।
बताया जाता है कि 16वीं शताब्दी से पहले इस गांव का नाम मरगुल था। बाद में चंबा के राजा उदय सिंह यहां आए और देवी की अष्टधातु की मूर्ति स्थापित की। इसके बाद गांव का नाम उदयपुर पड़ गया। यह गांव तांदी-किश्तवाड़ मार्ग पर चिनाब नदी (चंद्रा और भागा के संगम) के किनारे बसा हुआ है।
हिंदू यहां देवी को काली या मृकुला देवी के रूप में पूजते हैं, जबकि बौद्ध उन्हें वज्रराही का रूप मानते हैं। बौद्ध मान्यता के अनुसार प्रसिद्ध तांत्रिक संत पद्मसंभव ने अपनी यात्रा के दौरान इसी स्थान पर ध्यान लगाया था।
समय कितना भी बदल जाए, लेकिन मृकुला देवी मंदिर की मान्यताएं और परंपराएं आज भी वैसी ही हैं। यहां की आस्था, रहस्य और अद्भुत कारीगरी इस मंदिर को हिमाचल ही नहीं, पूरे देश में खास पहचान दिलाती है। यही वजह है कि हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, कुछ इतिहास जानने, कुछ आस्था के कारण और कुछ इस अद्भुत कला को देखने।