#धर्म
February 27, 2026
हिमाचल के इन देवता ने की भविष्यवाणी- साल भर में बीमारी, फसलों और घटनाओं पर दिए कई संकेत
किसानों के चेहरे पर खुशहाली लौटेगी
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कुल्लू। देवभूमि हिमाचल में देवी-देवताओं को सर्वोपरि माना जाता है। यहां देवी-देवताओं के सम्मान में कई उत्सव मनाए जाते हैं। कुल्लू जिले की रमणीय लगघाटी इन दिनों पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबी हुई है।
रोपड़ी, रूजग और ग्रामंग गांवों में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला पारंपरिक फागली उत्सव इस बार भी श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया जा रहा है। घाटी के आराध्य देव कतरूसी नारायण मंदिर से देवता की अगवानी होते ही पूरा क्षेत्र ढोल-नगाड़ों और रणसिंघों की ध्वनि से गूंज उठा।
फाल्गुन की शुरुआत के साथ ही जब देवता कतरूसी नारायण अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे हारियान और ग्रामीण देव रथ के साथ नृत्य करते हुए गांव-गांव पहुंचते हैं।
श्रद्धालु दूर-दराज से दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं और सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। देव रथ के ठहराव के दौरान शुद्ध घी से विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है। इस प्रसाद को पहले देवता को अर्पित किया जाता है और फिर हारियानों व ग्रामीणों में बांटा जाता है। पूरे आयोजन में सामूहिकता की झलक साफ दिखाई देती है।
उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह होता है जब देवता के गुर देव खेल के माध्यम से भविष्यवाणी करते हैं। इस वर्ष देवता कतरूसी नारायण के गुर नील चंद, भजन, पवन और मोहर सिंह ने घाटी के लोगों को कई अहम संकेत दिए।
देववाणी के अनुसार आने वाले समय में फसलों की पैदावार अच्छी रहने की संभावना है, जिससे किसानों के चेहरे पर खुशहाली लौटेगी। हालांकि, देवता ने आधुनिकता की अंधी दौड़ में पारंपरिक मूल्यों और रीति-रिवाजों के उपेक्षित होने पर चिंता भी जताई।
गुरों ने यह भी चेताया कि आगामी वर्ष में कुछ बीमारियों के फैलने की आशंका है, इसलिए लोगों को स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना होगा। देव संदेश में यह भी कहा गया कि घाटी के सभी देवी-देवता अपनी गठरी में इस वर्ष शुभ फल लेकर आए हैं, जो पूरे क्षेत्र के कल्याण और समृद्धि का प्रतीक है।
फागली उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का भी मंच है। उत्सव के दौरान हारियानों ने अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं से जुड़े प्रश्न देवता के समक्ष रखे। गुरों के माध्यम से देवता ने इन प्रश्नों के उत्तर दिए, जिन्हें ग्रामीण अत्यंत श्रद्धा से स्वीकार करते हैं।
विशेष जाति से संबंध रखने वाले अशोक ने बताया कि उनका देवता के साथ अत्यंत निकट संबंध है। उनके अनुसार देव परंपराओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है और उनके बिना कुछ धार्मिक प्रक्रियाएं अधूरी रहती हैं।

उन्होंने कहा कि फागली के दौरान देवता अपने जन्म, इतिहास और कुल्लू के अन्य देवी-देवताओं के साथ संबंधों के बारे में गूढ़ जानकारी भी साझा करते हैं, जिसे केवल परंपरा से जुड़े लोग ही समझ पाते हैं।
तारापुरी कोठी के आराध्य देव कतरूसी नारायण के आशीर्वाद से यह मेला खोपरी, रोपड़ी, भलियाणी और जठानी सहित कई गांवों में मनाया जाता है। कारदार रूम सिंह नेगी ने बताया कि इस उत्सव का धार्मिक महत्व इतना अधिक है कि कई परिवार अपने ज्येष्ठ पुत्र का मुंडन संस्कार भी इसी अवसर पर करवाते हैं, ताकि देवता का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
उत्सव के दौरान भंडारे की विशेष व्यवस्था की गई है, जहां श्रद्धालु सामूहिक रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं। गांव की महिलाएं पारंपरिक पकवान बनाकर आयोजन में सहयोग देती हैं, जबकि युवक व्यवस्था संभालते नजर आते हैं।
फागली उत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लगघाटी की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह पर्व पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है।
देवता की वाणी, ढोल-नगाड़ों की थाप और श्रद्धालुओं की आस्था के बीच लगघाटी एक बार फिर यह संदेश दे रही है कि परंपराएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी तय करती हैं।