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June 9, 2026

जीत कर भी 4 माह घर बैठेंगे ये BDC- ZP सदस्य, नहीं मिलेगा कार्यभार; सुक्खू सरकार के निर्देश पर बवाल

पंचायती राज चुनाव पर अधिसूचना का ब*म: एक-पद पर दो दावेदार

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CM Sulku Notification

केलांग/शिमला। हिमाचल प्रदेश में पहले ही निर्धारित समय से करीब चार महीने की देरी से संपन्न हुए पंचायती राज चुनावों के बाद अब एक नए सरकारी फरमान ने सूबे की सियासत में 'आग' लगा दी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार द्वारा जारी एक ताजा अधिसूचना ने नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों और विपक्षी दल भाजपा को सड़क से लेकर कोर्ट तक की लड़ाई के लिए मजबूर कर दिया है। सरकार ने आदेश दिया है कि लाहौल-स्पीति और चंबा के पांगी जैसे जनजातीय क्षेत्रों में नवनिर्वाचित बीडीसी और जिला परिषद सदस्य 18 अक्टूबर 2026 के बाद ही अपना कार्यभार संभाल सकेंगे।

लोकतंत्र का मज़ाक या प्रशासनिक मजबूरी?

हिमाचल की राजनीति में यह अपनी तरह का पहला मामला है, जहां चुनाव जीतने और जनादेश मिलने के बावजूद जनप्रतिनिधि "बेरोजगार" बैठे रहेंगे। सरकार का तर्क है कि वर्तमान में कार्यरत प्रतिनिधियों का कार्यकाल अक्टूबर तक शेष है, इसलिए प्रशासनिक निरंतरता के लिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि अगर कार्यकाल अक्टूबर तक था, तो मई-जून की तपती गर्मी में करोड़ों खर्च कर चुनाव करवाने और शपथ दिलाने का क्या औचित्य था? अब स्थिति यह है कि पंचायतों और ब्लॉकों में एक ही पद पर दो-दो प्रतिनिधि (एक पुराना और एक नवनिर्वाचित) मौजूद हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

 

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भाजपा का सुक्खू सरकार पर तीखा प्रहार

इस अधिसूचना के बाहर आते ही भाजपा ने सुक्खू सरकार को आड़े हाथों लिया है। भाजपा विधायक डॉ. जनक राज ने सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने गुपचुप तरीके से चुनावी प्रक्रिया के बीच 'एक्ट' में संशोधन किया है। उन्होंने इसे संविधान और पंचायती राज संस्थाओं का सीधा अपमान करार दिया है। जनक राज ने चेतावनी दी है कि सरकार का यह फैसला लोकतंत्र की हत्या है और भाजपा इसके खिलाफ हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी।

 

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जनजातीय क्षेत्रों में आक्रोश

सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा ने भी इस निर्णय को जनजातीय लोगों के साथ बड़ा अन्याय बताया है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि जब शपथ ग्रहण हो चुका है, तो फिर प्रतिनिधियों को उनके अधिकारों से वंचित रखना कहां का न्याय है? लाहौल-स्पीति विकास मंच के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सरकार से इस 'तुगलकी' फरमान को तुरंत वापस लेने की मांग की है।

 

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नवनिर्वाचित सदस्यों की चेतावनी

नवनिर्वाचित जिला परिषद सदस्य सुरेश कुमार सहित कई प्रतिनिधियों ने सरकार के इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि उन्हें जनता ने वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुना है, लेकिन सरकार उन्हें काम करने से रोक रही है। इन प्रतिनिधियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे आने वाले दिनों में अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों के लिए बड़ा आंदोलन छेड़ सकते हैं।

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हिमाचल की राजनीति में अधिसूचनाओं का दौर तो पुराना है, लेकिन चुनावों के बाद जीते हुए प्रत्याशियों को चार महीने के लिए 'वेटिंग लिस्ट' में डाल देना एक नया और विवादित प्रयोग है। देखना होगा कि हाई कोर्ट इस 'संवैधानिक संकट' पर क्या रुख अपनाता है।"

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