#राजनीति
October 9, 2026
20 साल से BJP की हार से परेशान पूर्व CM, खुद लड़ना चाहते हैं अगला चुनाव...
पालमपुर विधानसभा क्षेत्र है शांता कुमार का खास नाता
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश के सियासी इतिहास में पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का नाम उन नेताओं में लिया जाता है- जिन्होंने दशकों तक प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारियां संभालने वाले शांता कुमार के लिए पालमपुर का राजनीतिक महत्व हमेशा खास रहा है।
शांता कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। सत्ता में रहने से लेकर विपक्ष की भूमिका निभाने तक, उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके मन में एक ऐसी राजनीतिक इच्छा है, जिसका सीधा संबंध उनके गृह क्षेत्र पालमपुर से है।
वह चाहते हैं कि पालमपुर विधानसभा क्षेत्र में BJP फिर से जीत दर्ज करे। नवंबर 2025 में उन्होंने इस इच्छा को सार्वजनिक करते हुए कहा था कि वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव उनके जीवन का अंतिम चुनाव हो सकता है और वह BJP की जीत देखने के बाद ही ईश्वर के चरणों में जाना चाहते हैं।
कांगड़ा जिले का पालमपुर विधानसभा क्षेत्र शांता कुमार की राजनीतिक पहचान से लंबे समय से जुड़ा रहा है। इस सीट पर भाजपा की स्थिति में आए बदलाव को देखें तो पार्टी के लिए बीते कुछ चुनाव चुनौतीपूर्ण रहे हैं। वर्ष 1990 में शांता कुमार ने पालमपुर से विधानसभा चुनाव जीता था। इसके बाद वर्ष 2007 में भाजपा के प्रवीण शर्मा यहां से विधायक बने। मगर इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी अपनी पिछली सफलता दोहराने में नाकाम रही।
लगातार तीन विधानसभा चुनावों में पालमपुर से कांग्रेस के विधायक चुने गए, जबकि BJP को जीत के लिए इंतजार करना पड़ा। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बृज बिहारी लाल बुटेल ने BJP के प्रवीण शर्मा को हरा कर इस सीट पर कब्जा किया। फिर पांच साल बाद, 2017 में कांग्रेस ने आशीष बुटेल को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज की। साल 2022 के चुनाव में भी कांग्रेस ने इसी सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा।
पालमपुर में कांग्रेस की लगातार चुनावी सफलता के पीछे बुटेल परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। बृज बिहारी लाल बुटेल लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय रहे और विधानसभा अध्यक्ष जैसे पद पर भी कार्य कर चुके हैं। साल 2012 में उनकी जीत के बाद 2017 में उनके बेटे आशीष बुटेल ने कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे। साल 2022 में भी आशीष बुटेल ने जीत हासिल कर अपना दबदबा बरकरार रखा।
साल 2017 के चुनाव में आशीष बुटेल ने BJP की इंदु गोस्वामी को 4,324 मतों के अंतर से हराया था। वहीं, 2022 में उन्होंने BJP प्रत्याशी त्रिलोक कपूर को 5,328 मतों से पराजित किया। उस चुनाव में आशीष बुटेल को कुल 30,874 वोट मिले। जबकि त्रिलोक कपूर के पक्ष में 25,546 मत पड़े। लगातार दो चुनावों में आशीष बुटेल की जीत और उससे पहले उनके पिता की सफलता ने पालमपुर में कांग्रेस को लगातार तीन कार्यकाल तक प्रतिनिधित्व दिया।
इस चुनावी क्रम ने BJP के सामने क्षेत्र में अपना आधार दोबारा मजबूत करने की चुनौती खड़ी की। पालमपुर से शांता कुमार का पुराना जुड़ाव होने के कारण यहां पार्टी की हार उनके लिए विशेष महत्व रखती थी। ऐसे में उनकी जीत देखने की इच्छा को क्षेत्र में BJP की राजनीतिक वापसी की उम्मीद से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
नवंबर 2025 में शांता कुमार ने 2027 के विधानसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा था कि संभव है यह उनके जीवन का आखिरी चुनाव हो। उनका कहना था कि वह BJP को पालमपुर के साथ-साथ पूरे प्रदेश में जीतते देखना चाहते हैं। उनके बयान में उस क्षेत्र को लेकर लगाव साफ झलकता था- जहां से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की थीं।
हालांकि, उनके वक्तव्य का अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। वह पहले ही चुनाव लड़ने से दूरी बनाने का फैसला कर चुके हैं। उनकी इच्छा पार्टी की जीत देखने की है, विशेष रूप से पालमपुर में- जहां भाजपा को लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। 2027 का चुनाव पास आने के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा इस क्षेत्र में अपना पुराना जनाधार वापस पाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि शांता कुमार पहले ही चुनाव लड़ने से दूरी बनाने का निर्णय ले चुके हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की थी। इसलिए 2027 के चुनाव को लेकर उनका बयान खुद उम्मीदवार बनने की घोषणा नहीं है। वह भाजपा के वरिष्ठ नेता के रूप में अपनी पार्टी को जीतते देखने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे।
उनके बयान ने पालमपुर में भाजपा की लगातार हार के कारणों पर फिर चर्चा शुरू कर दी है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पुराने राजनीतिक आधार को कैसे मजबूत करे और मतदाताओं का समर्थन दोबारा कैसे हासिल करे।
शांता कुमार का राजनीतिक जीवन सिर्फ विधानसभा चुनावों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वर्ष 1963 में ग्राम पंचायत के पंच के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। इसके बाद पंचायत समिति और जिला परिषद में काम किया। वर्ष 1972 में वह पहली बार हिमाचल प्रदेश विधानसभा पहुंचे। आगे चलकर वह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में भी मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिन्होंने अपने राजनीतिक विचारों और सिद्धांतों को सार्वजनिक रूप से महत्व दिया। मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में काम करने के साथ-साथ उन्होंने लेखन और सामाजिक कार्यों में भी रुचि बनाए रखी। उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं तथा संस्थाओं के लिए काम करना रहा है।
12 सितंबर, 2026 को 92 वर्ष के हुए शांता कुमार ने अपने जन्मदिन पर कहा कि अब उनकी कोई राजनीतिक इच्छा शेष नहीं है। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर में सिद्धांतों के महत्व का उल्लेख किया और कहा कि अब वह अपना शेष जीवन विवेकानंद मेडिकल एंड रिसर्च ट्रस्ट के माध्यम से मानव सेवा के लिए समर्पित करना चाहते हैं।
शांता कुमार की अंतिम राजनीतिक इच्छा को उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और पालमपुर से जुड़े राजनीतिक संबंधों के संदर्भ में देखा जा सकता है। जिस क्षेत्र से उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं- वहां भाजपा की जीत देखना उनके लिए भावनात्मक महत्व रखता था।