#राजनीति
May 3, 2026
हिमाचल में सियासत की अनोखी जं.ग: एक सीट पर चुनावी प्रतिद्वंद्वी बने पति-पत्नी; बीजेपी-कांग्रेस ने दिए टिकट
ऊना के गगरेट और नूरपुर में एक ही सीट पर उतरे पति-पत्नी, सियासी मैदान में घर की जंग
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही सियासी माहौल पूरी तरह गर्मा गया है। लेकिन इस बार चुनावी मैदान सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई जगह यह मुकाबला ‘घर की जंग’ में तब्दील होता नजर आ रहा है। धर्मशाला में देवरानी-जेठानी की टक्कर के बाद अब कांगड़ा के नूरपुर और ऊना के गगरेट में पति-पत्नी एक ही सीट पर आमने-सामने आ खड़े हुए हैं, जिससे चुनावी रण बेहद रोचक हो गया है।
कांगड़ा जिले के नूरपुर नगर परिषद चुनाव में मुकाबला खासा चर्चा में है। यहां एक ही सीट पर पति पत्नी आमने सामने चुनावी रण में उतर चुके हैं। खास बात यह है कि यहां कांग्रेस ने अशोक शर्मा को उम्मीदवार बनाया है, तो भाजपा ने उनकी पत्नी रजना कुमारी को मैदान में उतार दिया है। एक ही घर के दो सदस्य अलग.अलग दलों के टिकट पर आमने.सामने हैं। ऐसे में यह मुकाबला अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है। क्षेत्र की जनता की नजरें इस दिलचस्प टक्कर पर टिकी हुई हैं।
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ऊना जिले की नगर पंचायत गगरेट के वार्ड नंबर.1 में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। यहां कुसुमलता और उनके पति तरसेम लाल एक ही सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों ही अनुभवी और मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। कुसुमलता जहां पूर्व उपप्रधान रह चुकी हैं, वहीं तरसेम लाल कई बार चुनाव जीत चुके हैं। इस मुकाबले को और दिलचस्प बनाने के लिए परिवार के ही अन्य सदस्य यानी उनके भतीजे ने भी अपनी दावेदारी ठोकते हुए नामांकन भर दिया है। जिससे यह सीट हॉट सीट बन गई है।
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धर्मशाला नगर निगम के वार्ड-7 में भी अनोखा सियासी समीकरण देखने को मिल रहा है। यहां कांग्रेस और भाजपा ने एक ही परिवार की देवरानी और जेठानी को आमने-सामने उतार दिया है। इस पारिवारिक मुकाबले ने पूरे क्षेत्र में चुनावी चर्चा को और तेज कर दिया है।
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राज्य के कई हिस्सों में ऐसे मुकाबले सामने आने से साफ है कि इस बार चुनाव सिर्फ विकास और मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारिवारिक समीकरण भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। घर के भीतर की यह ‘सियासी जंग’ अब खुले मैदान में आ गई है, जहां हर वोट के साथ रिश्तों की भी परीक्षा हो रही है।
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अब देखना यह दिलचस्प होगा कि जनता इन अनोखे मुकाबलों में किसे अपना समर्थन देती है। क्या रिश्ते राजनीति पर भारी पड़ेंगे या फिर पार्टी की विचारधारा जीत हासिल करेगी—यह फैसला आने वाले दिनों में मतपेटियां खोलेंगी।