#राजनीति
April 10, 2026
फेल हुआ CM सुक्खू का दांव: हाईकोर्ट ने पुराने विधायकों को पेंशन जारी करने के दिए आदेश
पेंशन जारी करने के आदेश, एक माह की समयसीमा तय
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में पूर्व विधायकों की पेंशन को लेकर चल रहे विवाद पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और विधानसभा सचिवालय को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पात्र याचिकाकर्ताओं की बकाया और नियमित पेंशन एक महीने में जारी की जाए।
अगर तय समयसीमा में भुगतान नहीं होता है, तो सरकार को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुनाया।
कोर्ट में राजिंदर राणा और रवि ठाकुर द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई, जिनमें पेंशन बहाल करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय की ओर से बताया गया कि पहले लाया गया वह संशोधन विधेयक- जिसमें अयोग्य घोषित विधायकों की पेंशन रोकने का प्रावधान था, राज्य सरकार ने वापस ले लिया है।
इसके स्थान पर अब नया विधेयक लाया गया है, जो सिर्फ 14वीं विधानसभा और उसके बाद निर्वाचित विधायकों पर लागू होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता 12वीं और 13वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं, इसलिए वे नए कानून के दायरे में नहीं आते। इसी आधार पर कोर्ट ने उन्हें पेंशन का हकदार मानते हुए भुगतान के निर्देश दिए।
इस फैसले से प्रदेश के पूर्व विधायकों को बड़ी राहत मिली है और लंबे समय से चला आ रहा विवाद काफी हद तक साफ हो गया है। गौरतलब है कि फरवरी 2024 में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के छह विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग किए जाने के बाद, विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था।
इसके बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने उनकी पेंशन रोकने के लिए संशोधन विधेयक पेश किया, लेकिन उसे राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई। बाद में सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने बजट सत्र में नया विधेयक लाया, जिसमें प्रावधान किया गया कि 14वीं विधानसभा या भविष्य में अयोग्य ठहराए जाने वाले विधायकों की पेंशन बंद की जा सकेगी। यह विधेयक अब राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।
अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो 14वीं विधानसभा के कुटलेहड़ से पूर्व विधायक देवेंद्र कुमार भुट्टों और गगरेट से चैतन्य शर्मा की पेंशन भी प्रभावित हो सकती है। वहीं, भाजपा विधायक आशीष शर्मा ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह निर्णय कांग्रेस सरकार की नीतियों पर करारा प्रहार है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने कानून का इस्तेमाल राजनीतिक बदले की भावना से किया। मगर अदालत ने साफ कर दिया कि कानून भविष्य के लिए होते हैं, न कि किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के लिए।