#राजनीति
February 7, 2026
हिमाचल कांग्रेस से हाईकमान की बेरुखी : 15 महीनों से बिना संगठन चल रहा काम- कैसे लड़ेंगे चुनाव?
दिल्ली से फैसला आने का सबको इंतजार- पार्टी को चुनाव की चिंता
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शिमला। हिमाचल कांग्रेस की सियासत में लंबे समय से पसरा संगठनात्मक सन्नाटा भी टूटने की कगार पर है। महीनों की खामोशी और अंदरूनी बेचैनी के बाद पार्टी अब एक्शन मोड में नजर आ रही है। संकेत साफ हैं कि हिमाचल कांग्रेस नई टीम मिलने का बेसब्री से इंतजार कर रही है।
वहीं, हिमाचल कांग्रेस पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को लेकर गहराता संकट अब खुलकर सियासी चर्चा का विषय बन चुका है। प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति में लगभग एक वर्ष का लंबा इंतजार और उसके बाद ढाई महीने बीत जाने के बावजूद भी संगठन का न बन पाना पार्टी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
हालात यह हैं कि अब खुद कांग्रेस के कई नेता भी संगठन के गठन को लेकर उम्मीद खोते नजर आ रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
कांग्रेस हाईकमान ने 6 नवंबर 2024 को एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए हिमाचल प्रदेश में राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर की सभी कार्यकारिणियों को एक साथ भंग कर दिया था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि पुराने ढांचे को हटाकर पार्टी को नए सिरे से मजबूत, सक्रिय और अनुशासित संगठन दिया जाएगा।
करीब 15 महीने बीत जाने के बाद भी संगठन का पुनर्गठन नहीं हो पाया है। यह देरी अब पार्टी के लिए बोझ बनती जा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार के हालिया बयान से यह साफ झलकता है कि प्रदेश नेतृत्व खुद को इस पूरे मामले में निर्णयकारी भूमिका में नहीं मान रहा।
उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह अपनी बात हाईकमान के समक्ष रख चुके हैं और अब फैसला दिल्ली को ही लेना है। इस बयान ने यह संदेश दिया है कि संगठन गठन की कमान पूरी तरह हाईकमान के हाथ में है और प्रदेश नेतृत्व केवल प्रतीक्षा की स्थिति में है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता में होने के बावजूद संगठन का न बन पाना किसी भी पार्टी के लिए खतरे की घंटी माना जाता है। इससे न केवल पार्टी की अंदरूनी एकजुटता प्रभावित होती है, बल्कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल भी कमजोर पड़ता है।
यह पूरी स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं और नगर निकायों के चुनाव नजदीक हैं। नगर निगम चुनाव पार्टी चिन्ह पर लड़े जाते हैं, जिसमें मजबूत संगठन की भूमिका बेहद अहम होती है।
मगर कांग्रेस का राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर का ढांचा ही अधूरा होने से पार्टी की चुनावी तैयारियों पर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक नेतृत्व स्पष्ट नहीं होगा, तब तक न तो बूथ स्तर पर रणनीति बन पाएगी और न ही उम्मीदवार चयन और प्रचार अभियान को दिशा मिल पाएगी। यही वजह है कि कई क्षेत्रों में कांग्रेस कार्यकर्ता खुद को असहाय और हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।
संगठन के गठन में हो रही देरी को लेकर कांग्रेस सरकार के भीतर से भी असंतोष सामने आ चुका है। राज्य के कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने सार्वजनिक मंच से संगठन को ‘पैरालाइज्ड’ करार दिया था। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी अब खुलकर उजागर हो रही है।
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता संगठन के शीघ्र गठन की मांग हाईकमान से कर चुके हैं। संगठन सृजन अभियान के तहत केंद्रीय नेतृत्व ने कई नेताओं को हिमाचल प्रदेश भेजा, लेकिन इसका जमीनी स्तर पर कोई ठोस असर दिखाई नहीं दिया।
हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद 11 संगठनात्मक जिलों में जिला अध्यक्षों की तैनाती जरूर की गई है, लेकिन शिमला ग्रामीण और किन्नौर जैसे महत्वपूर्ण जिलों में अब तक अध्यक्ष तय नहीं हो पाए हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार और पूर्व अध्यक्ष प्रतिभा सिंह समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता अनेक बार संगठन के मुद्दे को लेकर दिल्ली जा चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी भी इस विषय पर बैठकें कर चुके हैं, लेकिन अब तक किसी ठोस निर्णय पर सहमति बनती नहीं दिख रही।
हिमाचल कांग्रेस में इस सियासी हलचल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस संगठनात्मक असमंजस से क्यों जूझ रही है? क्या आने वाले चुनावों से पहले पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या फिर इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर देखने को मिलेगा-यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।